धान खरीदी 2025-26: ‘धन महायज्ञ’ की तैयारियाँ जोरों पर — रीवा संभाग में फिर गूंज रही है भ्रष्टाचार की ढोलक
रीवा। खरीफ वर्ष 2025–26 की धान खरीदी की तैयारियाँ जोरों पर हैं। प्रशासनिक स्तर पर इसे “किसानों के हित” का बड़ा अभियान बताया जा रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि यह खरीदी एक ‘धन महायज्ञ’ का रूप ले चुकी है — जिसमें नेता, अधिकारी, तथाकथित पत्रकार और गांव के दबंग चारों ‘पंडितों’ की भूमिका निभाते हैं। हर किसी की अपनी ‘आहुति’ और अपना हिस्सा तय है।
नियम विरुद्ध कार्यों का जाल
धान खरीदी केंद्रों की स्थापना से लेकर धान के उठाव तक, हर चरण में नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। किसानों को मिलने वाले बारदाने (धान बोरी) में 40 किलो की जगह अक्सर 37–38 किलो ही भराई की जाती है। गुणवत्ता विहीन धान को खरीदने के लिए जिले के प्रशासनिक अमले में बैठे कुछ प्रभावशाली अधिकारी और सफेदपोश नेता मिलकर फर्जी प्रमाण पत्र तैयार करवाते हैं।
‘सेवा शुल्क’ की स्थायी परंपरा
धान खरीदी केंद्रों पर सेवा शुल्क के नाम पर प्रति क्विंटल ₹20 से ₹25 तक की वसूली आम बात हो गई है। पिछले वर्ष जिले में लाखों मैट्रिक टन धान खरीदा गया था — ऐसे में यह रकम करोड़ों में पहुँचती है, मगर यह धन आखिर किसकी तिजोरी में जाता है, यह अब तक जांच का विषय बना हुआ है।
कार्यालयों में बैठा ‘यज्ञ समिति’ तंत्र
कुछ अधिकारी तो खरीदी केंद्रों पर कभी नहीं जाते, बल्कि अपने दफ्तरों से ही इस ‘महायज्ञ’ का संचालन करते हैं। खरीदी केंद्रों के प्रभारी उनके कार्यालय में जाकर ‘आहुति’ देते हैं, तभी काम बनता है। बताया जाता है कि कार्यालय में बैठे ऐसे पाँच अधिकारी पूरे जिले के खरीदी तंत्र पर नियंत्रण बनाए हुए हैं।
स्थानीय स्तर पर वसूली और भ्रष्टाचार
गांवों में धान में नंबर लगवाने, केंद्र पर धान चढ़वाने, या ट्रांसपोर्ट के नाम पर बिल काटने तक हर स्तर पर वसूली होती है। स्थानाभाव और सुरक्षा की कमी के कारण कई केंद्रों में चोरी की घटनाएँ भी आम हैं। यही कारण है कि कई केंद्र प्रभारी आज मालामाल हो चुके हैं, तो कई कार्रवाई और बदनामी के डर से गायब हैं।
एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया —
“पिछले साल मैंने ‘सेवा शुल्क’ नहीं दिया था, इसलिए मुझे ब्लैकलिस्ट कर दिया गया। जब तक ऊपर तक हिस्सा नहीं पहुँचता, कोई भी अधिकारी खरीदी में टिक नहीं सकता।”
कार्रवाई से पहले तबादले का खेल
पिछले वर्ष गुणवत्ता अधिनियम, फर्जी भंडारण बिल, और काल्पनिक परिवहन के मामले में कुछ जांचें शुरू हुई थीं, परंतु जैसे ही अधिकारियों के नाम सामने आए, तबादले कर दिए गए। उदाहरणस्वरूप, रीवा के तत्कालीन धन्यवाद अधिकारी मालवी पर कार्रवाई का प्रयास तो हुआ, मगर शुरुआत होते ही उनका हस्तांतरण कर दिया गया।
बिचौलियों की सक्रियता
इस बार भी धान खरीदी केंद्रों में तैयारी पूरी है। बिचौलिये ₹14–₹15 प्रति किलो के दर पर पहले से ही सीमावर्ती क्षेत्रों में धान का भंडारण कर रहे हैं, ताकि बाद में सरकारी केंद्रों पर मोटे लाभ से बिक्री की जा सके। वहीं किसानों के नाम पर काल्पनिक पंजीयन और गिरदावली का खेल फिर से शुरू हो चुका है।
अंत में धान खरीदी के इस ‘धन यज्ञ’ में इस बार भी कौन कितना लाभ उठाएगा और कौन बलि का बकरा बनेगा, यह आने वाला समय बताएगा। लेकिन इतना तय है कि जब तक यह यज्ञ ऐसे ही चलता रहेगा —
धान किसान के घर नहीं, नेताओं और अफसरों की तिजोरी में ही भरेगा।




