रीवा और मऊगंज जिलों में पिछले छह महीने से जिला पंचायत सीईओ की नियुक्ति नहीं हुई है, जिससे पंचायतीराज व्यवस्था पूरी तरह चरमराई हुई है। जिले के सरपंच, सचिव और आम जनता अपने छोटे-छोटे कामों के लिए भटक रहे हैं। प्रभार में चल रहे प्रशासनिक कामकाज की धीमी गति ने ग्रामीण विकास की योजनाओं को बुरी तरह प्रभावित किया है।
पंचायतीराज व्यवस्था का संकट
रीवा और मऊगंज जिलों में कुल 820 से अधिक ग्राम पंचायतें हैं। इन पंचायतों के प्रतिनिधि और ग्रामीण रोजमर्रा की समस्याओं का समाधान कराने के लिए जिला पंचायत कार्यालय पहुंचते हैं। लेकिन जिला पंचायत सीईओ का पद खाली होने के कारण उन्हें निराश लौटना पड़ रहा है।
फिलहाल जिला पंचायत के काम का प्रभार एडिशनल कलेक्टर के पास है, जो पहले से ही अन्य जिम्मेदारियों से लदे हुए हैं। ऐसे में ग्रामीणों की समस्याओं का समाधान प्राथमिकता में नहीं है।
जनता की बढ़ती पीड़ा
सीईओ की अनुपस्थिति ने ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्यों को लगभग रोक दिया है। पेयजल, सड़क निर्माण, स्वच्छता अभियान, और अन्य योजनाओं की गति ठहर सी गई है।
रीवा जिले के एक सरपंच ने नाम न छापने की शर्त पर कहा:
> "छोटे-छोटे काम जैसे नाली निर्माण, बिजली सुधार या सड़क मरम्मत के लिए कई बार जिला पंचायत जाना पड़ता है। लेकिन सीईओ के न होने से हमारी बात कोई सुनने वाला नहीं है।"
सरकार की प्राथमिकता पर सवाल
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति सत्ताधारी पार्टी की गंभीर प्रशासनिक उदासीनता और सत्ता के केंद्रीकरण की नीति को दर्शाती है।
सामाजिक कार्यकर्ता कविता तिवारी ने कहा:
> "सरकार का पूरा ध्यान सत्ता पर पकड़ मजबूत करने में है। जिला पंचायत जैसे महत्वपूर्ण पद खाली रखना ग्रामीण जनता के साथ अन्याय है।"
भ्रष्टाचार और राजनीतिक दखलंदाजी
विशेषज्ञों का मानना है कि राजनीतिक हस्तक्षेप और भ्रष्टाचार इस स्थिति के पीछे मुख्य कारण हैं। सत्ताधारी दल के कुछ नेता प्रशासनिक नियुक्तियों में अपनी पसंद के अधिकारियों को बैठाने के लिए दबाव बना रहे हैं, जिससे नियुक्ति प्रक्रिया बाधित हो रही है।
ग्रामीण विकास विशेषज्ञ अरुण त्रिपाठी ने कहा:
> "रीवा और मऊगंज में सत्ताधारी दल के नेताओं की मनमानी ने पूरी पंचायतीराज व्यवस्था को हाईजैक कर लिया है। यह लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक स्थिति है।"
ग्रामीण विकास पर असर
दीनदयाल अंत्योदय योजना, जल जीवन मिशन, और मनरेगा जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं पर भी सीधा प्रभाव पड़ा है। जिला पंचायत सीईओ की गैरमौजूदगी ने इन योजनाओं के क्रियान्वयन को रोक दिया है। ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, पेयजल, और सिंचाई परियोजनाएं अधर में लटकी हुई हैं।
रीवा निवासी सामाजिक कार्यकर्ता विनोद शर्मा ने कहा:
> "पंचायत स्तर की योजनाएं सीधे जनता की जरूरतों से जुड़ी होती हैं। लेकिन प्रशासनिक लापरवाही के कारण गांवों का विकास रुक गया है।"
भ्रष्टाचार का चरम
प्रदेश में बड़े-बड़े घोटालों की खबरें जनता का विश्वास तोड़ रही हैं। जल जीवन मिशन, हरियाली योजना, और ई-टेंडर जैसे मामलों में अरबों रुपये के घोटाले सामने आए हैं। ऐसे में जिला पंचायत की व्यवस्थागत खामियां भ्रष्टाचार को और बढ़ावा दे रही हैं।
भविष्य के लिए चेतावनी
विश्लेषकों का कहना है कि यदि जनता ने नेताओं से जवाबदेही की मांग नहीं की, तो यह स्थिति और खराब हो सकती है। सत्ताधारी दल का अत्यधिक केंद्रीकरण न केवल विपक्ष को कमजोर कर रहा है, बल्कि जनता को भी अपने अधिकारों से वंचित कर रहा है।
निष्कर्ष
रीवा और मऊगंज की जिला पंचायत की मौजूदा स्थिति प्रशासनिक उदासीनता और सत्ताधारी पार्टी के अत्यधिक हस्तक्षेप का परिणाम है। यह स्पष्ट है कि यदि जनता ने समय रहते अपनी आवाज नहीं उठाई, तो यह "सुशासन" की जगह "दुशासन" की तरफ बढ़ता जाएगा।
"लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि होती है। अब समय आ गया है कि जनता अपनी जिम्मेदारी समझे और जवाबदेही की मांग करे।"


