गढ़ की सड़क या मौत का जाल? आखिर कब टूटेगी प्रशासन की चुप्पी और कब जागेंगे जनप्रतिनिधि?
संपादकीय विंध्य वसुंधरा समाचार रीवा मध्यप्रदेश
रीवा जिले से लगभग 50 किलोमीटर दूर स्थित गढ़ कस्बा आज विकास नहीं, बल्कि उपेक्षा की जीती-जागती तस्वीर बन चुका है। आज़ादी के दशकों बाद भी यदि किसी क्षेत्र की पहचान टूटी सड़कें, जलभराव, अतिक्रमण, गंदगी और बदहाल व्यवस्थाएँ हों, तो यह केवल विकास की कमी नहीं, बल्कि व्यवस्था की गंभीर विफलता है।
गढ़ की पुरानी बाजार से गुजरने वाली पुरानी राष्ट्रीय राजमार्ग-27 आज सड़क कम और दुर्घटनाओं का स्थायी केंद्र अधिक दिखाई देती है। बरसात शुरू होते ही यह मार्ग गहरे गड्ढों, कीचड़ और जलभराव में बदल जाता है। पैदल चलना मुश्किल है, दोपहिया वाहन रोज़ फिसलते हैं, चारपहिया वाहन क्षतिग्रस्त होते हैं और एम्बुलेंस तक को रास्ता बनाने में कठिनाई होती है। इसी मार्ग से हजारों ग्रामीण, विद्यार्थी, व्यापारी, किसान और मरीज प्रतिदिन गुजरते हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस सड़क की जिम्मेदारी किसकी है?
क्या लोक निर्माण विभाग की?
क्या जिला प्रशासन की?
क्या स्थानीय जनप्रतिनिधियों की?
या फिर गढ़ की आम जनता की, जो हर दिन अपनी जान जोखिम में डालकर इस सड़क से गुजरने को मजबूर है?
पिछले दस वर्षों में न जाने कितनी शिकायतें हुईं, कितनी खबरें प्रकाशित हुईं, कितने ज्ञापन सौंपे गए और कितने आश्वासन दिए गए। जुलाई 2025 में भी इस सड़क की बदहाली प्रमुख समाचार बनी। सीएम हेल्पलाइन में शिकायतें दर्ज हुईं। समाजसेवियों ने आवाज़ उठाई। स्थानीय विधायक नरेंद्र प्रजापति ने भी सड़क निर्माण की मांग करते हुए प्रशासन को पत्र लिखा।
लेकिन हुआ क्या?
कुछ गिट्टी डाली गई, थोड़ा-सा पैचवर्क हुआ और फिर सब कुछ पहले जैसा हो गया। समस्या खत्म नहीं हुई, केवल चर्चा खत्म कर दी गई।
आज फिर बारिश आ गई है। सड़क पहले से अधिक टूट चुकी है। हर गड्ढा एक नए हादसे का इंतजार करता दिखाई देता है।
दुर्भाग्य यह है कि व्यवस्था तब जागती है जब कोई बड़ी दुर्घटना होती है, जब किसी परिवार का चिराग बुझ जाता है, जब किसी बच्चे की जान चली जाती है या जब कोई व्यक्ति जीवनभर के लिए दिव्यांग हो जाता है। क्या गढ़ की सड़क भी किसी ऐसे ही बड़े हादसे का इंतजार कर रही है?
यदि नहीं, तो फिर तत्काल कार्रवाई क्यों नहीं?
यह केवल सड़क नहीं, हजारों लोगों के जीवन, शिक्षा, स्वास्थ्य और व्यापार का प्रश्न है।
आज गढ़ की जनता प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से टकराव नहीं चाहती, बल्कि जवाब चाहती है।
सड़क का पुनर्निर्माण कब होगा?
नालियों का निर्माण कब होगा?
अतिक्रमण कब हटेगा?
जिम्मेदार अधिकारियों का स्थल निरीक्षण कब होगा?
निर्माण कार्य की समय-सीमा जनता को कब बताई जाएगी?
यह संपादकीय जिला प्रशासन, लोक निर्माण विभाग और क्षेत्र के सभी जनप्रतिनिधियों से खुली अपील करता है कि वे बिना देरी किए गढ़ का संयुक्त स्थल निरीक्षण करें, तकनीकी सर्वे कराएँ और युद्धस्तर पर सड़क निर्माण तथा जल निकासी का कार्य शुरू करें।
गढ़ की जनता अब केवल आश्वासन नहीं, परिणाम देखना चाहती है।
यदि विकास योजनाएँ कागज़ों में पूरी हो सकती हैं, तो ज़मीन पर क्यों नहीं?
यदि करोड़ों रुपये विकास पर खर्च हो सकते हैं, तो गढ़ की यह जीवनरेखा सड़क क्यों उपेक्षित है?
अब समय आ गया है कि जिम्मेदार विभाग अपनी जवाबदेही निभाएँ। जनता की आवाज़ को अनसुना करना किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं है। गढ़ को भाषण नहीं, निर्माण चाहिए; निरीक्षण नहीं, क्रियान्वयन चाहिए; और सबसे बढ़कर—ऐसी सड़क चाहिए जिस पर लोग डर नहीं, विश्वास के साथ चल सकें।



