पत्रकारिता की गरिमा पर संकट: फर्जी पत्रकारों की बढ़ती सक्रियता और अवैध वसूली पर नियंत्रण आवश्यक
रीवा, मऊगंज और रीवा जिलों में पत्रकारिता के नाम पर अवैध गतिविधियों का बढ़ता प्रभाव
विंध्य वसुंधरा समाचार:- शैलेन्द्र मिश्रा
पत्रकारिता समाज का एक पवित्र और सम्मानित पेशा है, जो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। इसका उद्देश्य समाज में सच्चाई लाना, जनता की समस्याओं को उजागर करना और सरकार तथा जनता के बीच पुल का कार्य करना है। लेकिन आज इस पेशे की गरिमा पर कुछ असामाजिक तत्वों ने सवाल खड़े कर दिए हैं। रीवा, मऊगंजजिलों में फर्जी पत्रकारों की गतिविधियां और अवैध वसूली की घटनाएं पत्रकारिता के इस पवित्र पेशे को कलंकित कर रही हैं।
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(यह तस्वीरें काल्पनिक है) |
फर्जी पत्रकारिता: समाज पर एक दाग
वर्तमान में रीवा और आसपास के इलाकों में कई ऐसे व्यक्ति सक्रिय हैं, जो पत्रकारिता के नाम पर गलत गतिविधियों में लिप्त हैं।
ये लोग अपने वाहनों पर "प्रेस" और "पत्रकार" लिखकर घूमते हैं और सरकारी योजनाओं, दुकानों, आंगनबाड़ी केंद्रों, उचित मूल्य की दुकानों, एवं सरकारी निजी विद्यालयों छोला छाप डॉक्टर से और ग्रामीण इलाकों में अवैध वसूली करते हैं।
कई बार ये झोलाछाप डॉक्टरों, मेडिकल स्टोर और किसानों से धान-गेहूं की खरीदी के नाम पर अवैध धन वसूलते हैं।
इनकी गतिविधियां प्रशासन और पुलिस को भी भ्रमित करती हैं, क्योंकि रात में "प्रेस" लिखे वाहन देखकर अधिकारी इन्हें वास्तविक पत्रकार समझकर छोड़ देते हैं।
पत्रकारिता की छवि पर संकट
पत्रकारिता का उद्देश्य समाज को सही दिशा देना और सच्चाई को उजागर करना है। लेकिन इन फर्जी पत्रकारों की वजह से:
1. पत्रकारिता की छवि धूमिल हो रही है।
2. आम जनता में पत्रकारों के प्रति अविश्वास बढ़ रहा है।
3. समाज में अपराध और अराजकता को बढ़ावा मिल रहा है।
4. वास्तविक और ईमानदार पत्रकारों की प्रतिष्ठा पर आंच आ रही है।
फर्जी पत्रकारों की गतिविधियों का दुष्प्रभाव
सरकारी कार्यालयों में अक्सर यह सुनने को मिलता है कि किसी "पत्रकार" ने जांच के नाम पर दबाव डाला।
ग्रामीण इलाकों में ये लोग बेरोजगार युवाओं और कमजोर वर्गों को शोषण का शिकार बना रहे हैं।
कई बार ये फर्जी पत्रकार पुलिस थानों में भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं और अधिकारियों पर दबाव बनाने का प्रयास करते हैं।
समस्या का समाधान: प्रशासनिक और सामाजिक कदम
इस समस्या को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन और समाज को मिलकर ठोस कदम उठाने होंगे।
1. प्रशासनिक उपाय:
विशेष अभियान:
फर्जी पत्रकारों की पहचान के लिए एक विशेष अभियान चलाया जाए। इस अभियान के तहत ऐसे लोगों की सूची बनाई जाए, जो पत्रकारिता का दुरुपयोग कर रहे हैं।
टोल-फ्री हेल्पलाइन:
जनता को जागरूक करने के लिए एक टोल-फ्री नंबर जारी किया जाए, जहां लोग फर्जी पत्रकारों की सूचना दे सकें।
वाहनों की जांच:
"प्रेस" लिखे वाहनों के दस्तावेजों और प्रमाण पत्रों की नियमित जांच की जाए।
बिना मान्यता के "प्रेस" लिखने वालों पर कड़ी कार्रवाई की जाए।
परिवहन विभाग के नियमों के तहत ही वाहनों पर प्रेस शब्द लिखने की अनुमति दी जाए।
खुफिया जांच:
प्रशासन एक खुफिया जांच टीम गठित करे, जो ग्रामीण इलाकों में इन फर्जी पत्रकारों की गतिविधियों पर नजर रखे और उनकी सच्चाई उजागर करे।
2. पुलिस और कानूनी सख्ती:
पुलिस को निर्देश दिया जाए कि फर्जी पत्रकारों पर कड़ी नजर रखी जाए।
थानों में ऐसे व्यक्तियों की पहचान सुनिश्चित की जाए, जो पत्रकारिता के नाम पर दबाव बनाने का प्रयास करते हैं।
अवैध वसूली में लिप्त पाए जाने पर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो।
3. समाज और पत्रकारिता संगठन का योगदान:
जागरूकता अभियान:
पत्रकारिता संगठनों को फर्जी पत्रकारों के खिलाफ जनता और प्रशासन को जागरूक करना चाहिए।
मान्यता प्रणाली लागू करें:
केवल मान्यता प्राप्त पत्रकारों को ही मीडिया कवरेज का अधिकार दिया जाए।
ईमानदार पत्रकारों की भूमिका:
वास्तविक पत्रकारों को इन फर्जी तत्वों के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए और प्रशासन का सहयोग करना चाहिए।

