विंध्य वसुंधरा समाचार शैलेन्द्र मिश्रा रीवा
मध्य प्रदेश के रीवा और मऊगंज जिलों में गायों की दयनीय स्थिति आज एक गंभीर समस्या बन चुकी है। एक ओर इन जिलों में आवारा गायों एवम् मवेशियों के कारण सड़क दुर्घटनाओं में निरंतर वृद्धि हो रही है, जिसमें इंसानों के साथ-साथ गायों एवं अन्य मवेशियों का भी जीवन खतरे में पड़ रहा है। दूसरी ओर, सनातन धर्म में गाय को माता का दर्जा दिया गया है, हिन्दू मान्यता के अनुसार माता तीन होती है। गाय माता धरती माता और जन्म देने वाली माता है। समाज में इन्हें पवित्र स्थान प्राप्त है। धार्मिक दृष्टि से जन्म से मृत्यु तक गाय का उपयोग और महत्व माना गया है, फिर भी वर्तमान स्थिति में इन पवित्र पशुओं की अवहेलना हो रही है।
गौशालाओं की स्थापना, परंतु अव्यवस्थित प्रबंधन
गायों के संरक्षण और देखभाल के उद्देश्य से कई गौशालाओं की स्थापना की गई है, परंतु इन गौशालाओं में सही प्रबंधन और सुविधाओं की कमी के कारण गायें भूख, प्यास और ठंड से दम तोड़ रही हैं। सरकार और समाज का यह उत्तरदायित्व बनता है कि वे इन गौशालाओं में आवश्यक संसाधन और देखभाल सुनिश्चित करें, ताकि गायें सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन जी सकें। एक ओर जहां शासन स्तर पर बड़े आयोजन और प्रचार-प्रसार होते हैं, वहीं गौशालाओं की हालत जलियांवाला बाग जैसी बन चुकी है, जहां बिना ध्यान दिए गायें भूख और प्यास से दम तोड़ देती हैं।
स्थायी समाधान की आवश्यकता: कुटीर उद्योगों और गो उत्पादों का विकास
गाय के दूध, गोबर और गोमूत्र से अनेक उत्पाद बन सकते हैं, जो न केवल धार्मिक और स्वास्थ्य की दृष्टि से बल्कि आर्थिक और पर्यावरणीय दृष्टि से भी लाभदायक हैं। जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए गोबर से खाद, गोमूत्र से कीटनाशक, और अन्य उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। यह आवश्यक है कि सरकार इन कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन दे, ताकि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी बनें और गायों के संरक्षण में भी मदद मिले। अगर गांवों में ही छोटे-छोटे उद्योग स्थापित किए जाएं, तो इससे किसानों को अतिरिक्त आय के साथ पर्यावरण को भी लाभ होगा, जिससे रासायनिक खादों का उपयोग कम किया जा सकेगा और भूमि की उर्वरता बनी रहेगी।
समाज की भूमिका: हर घर में एक गाय अपनाने की अपील
समाज की जागरूकता भी गायों के संरक्षण में एक अहम भूमिका निभा सकती है। यदि हर परिवार या हर गांव में एक-एक गाय या गौपुत्र को अपनाने का प्रयास हो, तो आवारा गायों की समस्या काफी हद तक हल हो सकती है। गायें न केवल धार्मिक, बल्कि सांस्कृतिक और कृषि जीवन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। एक स्वस्थ समाज का यह कर्तव्य है कि वह अपने धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों का सम्मान करे और उनके संरक्षण के लिए आगे आए।
सरकार से अपील: गौशालाओं में पारदर्शिता और निगरानी की आवश्यकता
सरकार को चाहिए कि गौशालाओं में नियमित और पारदर्शी निगरानी प्रणाली लागू करे। यह भी आवश्यक है कि स्थानीय प्रशासन द्वारा समय-समय पर जांच की जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि गायों के लिए आवश्यक आहार, पानी, और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। इसके अलावा, निजी स्तर पर संचालित गौशालाओं में भी स्वच्छता, आहार, और सुरक्षा के मानकों का पालन सुनिश्चित हो।
गायों का संरक्षण: धार्मिक, पर्यावरणीय और स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से आवश्यक
गायों का संरक्षण केवल धार्मिक नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और पर्यावरण के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। गाय के गोमूत्र से जल शुद्धिकरण होता है, जबकि रासायनिक खादों से हमारी जल स्रोत दूषित हो रहे हैं। इसी प्रकार, जैविक खाद से खेती करने से भूमि की उर्वरता बनी रहती है और अनाजों में रसायनों की मात्रा कम होती है, जो स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है।
गाय के संरक्षण और आवारा पशुओं की समस्या के समाधान के लिए समाज, सरकार, और हर नागरिक का सहयोग आवश्यक है। यह समस्या केवल प्रचार और आयोजन से नहीं सुलझाई जा सकती, बल्कि इसे सामाजिक जिम्मेदारी मानते हुए ठोस कदम उठाने होंगे। यदि समाज और सरकार मिलकर अपने कर्तव्यों का पालन करें, तो रीवा और मऊगंज ही नहीं, संपूर्ण देश में गायों की दशा सुधारी जा सकती है।

