रीवा जिले के गंगेव विकासखंड के ग्राम घोपी में नरवाई प्रबंधन को लेकर एक विशेष कृषक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों को धान की फसल कटाई के बाद बची पराली को जलाने के दुष्प्रभावों से अवगत कराना और पराली प्रबंधन के लिए आधुनिक व टिकाऊ तकनीकों को बढ़ावा देना था।
पराली प्रबंधन पर जागरूकता
संगोष्ठी में विशेषज्ञों ने पराली जलाने से होने वाले नुकसान पर विस्तार से चर्चा की। किसानों को बताया गया कि पराली जलाने से मिट्टी की उर्वरता घटती है, हानिकारक गैसें वातावरण में फैलती हैं और पर्यावरणीय संतुलन प्रभावित होता है। इसका विकल्प देते हुए उन्हें आधुनिक उपकरणों जैसे सुपर सीडर और अन्य जैविक प्रबंधन तकनीकों का उपयोग करने की सलाह दी गई।
सुपर सीडर से खेती का प्रदर्शन
कार्यक्रम के दौरान वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी एस.एस. सरल ने सुपर सीडर मशीन का उपयोग कर धान की पराली को खेत में मिलाकर सीधे बुआई का प्रदर्शन किया। इस विधि से न केवल पराली जलाने की आवश्यकता समाप्त होती है, बल्कि यह मिट्टी को पोषक तत्व भी प्रदान करती है। इस तकनीक ने किसानों का ध्यान आकर्षित किया और उन्होंने इसे अपनी खेती में अपनाने का उत्साह दिखाया।
किसानों को मिला समर्थन
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि, नायब तहसीलदार सुश्री महिमा पाठक, ने अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग के किसानों को मसूर के बीज मिनीकिट वितरित किए। उन्होंने किसानों को सरकारी योजनाओं और सब्सिडी की जानकारी देते हुए पराली प्रबंधन के लिए जागरूक किया। उन्होंने कहा कि किसान इन उपायों को अपनाकर अपनी उपज बढ़ा सकते हैं और पर्यावरण संरक्षण में योगदान दे सकते हैं।
विशेषज्ञों की मौजूदगी
कार्यक्रम में कृषि विस्तार अधिकारी श्री संजीव वर्मा, श्री सुधांशु शुक्ला, युगल किशोर प्रधान, आदर्श पांडेय, और श्री अभिषेक शर्मा जैसे विशेषज्ञ उपस्थित थे। उन्होंने किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन, फसल चक्र और जैविक खाद के उपयोग के फायदे बताए।
किसानों की सकारात्मक भागीदारी
संगोष्ठी में सैकड़ों किसानों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। उन्होंने पराली प्रबंधन के महत्व और सुपर सीडर जैसी तकनीकों की उपयोगिता को समझा। कई किसानों ने इसे अपने खेतों में अपनाने की इच्छा जताई।
किसानों के साथ चर्चा और सुझाव सत्र के बाद कार्यक्रम का समापन हुआ। यह संगोष्ठी पर्यावरण के अनुकूल खेती और किसानों की आय बढ़ाने के लिए एक महत्वपूर्ण पहल साबित हुई।
(यह संगोष्ठी न केवल किसानों को जागरूक करने का प्रयास थी, बल्कि उनकी खेती को आधुनिक तकनीकों से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी थी।)


