गुप्ता परिवार की नाबालिक बेटी की गुमशुदगी: प्रशासन की लापरवाही से परेशान, अब न्यायालय से न्याय की अपील
विंध्य वसुंधरा समाचार रीवा
थाना गढ़ क्षेत्र के गुप्ता परिवार के लिए पिछले दो साल एक दुखद संघर्ष की कहानी बन गए हैं। उनकी नाबालिक बेटी, जो 18 दिसंबर 2022 को घर से लापता हो गई थी, आज तक किसी भी ठोस सुराग के बिना गायब है। परिवार ने प्रशासन से बार-बार मदद की गुहार लगाई, लेकिन अब तक बच्ची का कोई भी पता नहीं चल सका। बच्ची की गुमशुदगी ने परिवार की मानसिक और भावनात्मक स्थिति को बुरी तरह प्रभावित किया है। इसके अलावा, हाल ही में बच्ची के दादा (पिता के पिता) का ब्रेन हेमरेज से निधन हो गया, जिससे परिवार का दर्द और भी बढ़ गया है।
गुप्ता परिवार का कहना है कि बच्ची की खोजबीन के लिए प्रशासन ने कभी भी गंभीर कदम नहीं उठाए। उनका मानना है कि अगर किसी बड़े या प्रभावशाली व्यक्ति की बच्ची लापता होती, तो प्रशासन तुरंत कार्रवाई करता और उसका खुलासा कर देता। लेकिन एक गरीब परिवार के लिए यह स्थिति बिल्कुल अलग है। "यदि किसी बड़े आदमी की बच्ची गायब होती, तो प्रशासन तुरंत उसे ढूंढने के लिए कदम उठाता। लेकिन एक गरीब परिवार के मामले में किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता," गुप्ता परिवार के सदस्य बताते हैं।
परिवार के इस दर्दनाक संघर्ष को अब सुलझाने के लिए उन्होंने एक निर्णायक कदम उठाने का निर्णय लिया है। गुप्ता परिवार अब अपने अधिकारों के लिए न्यायालय की शरण में जाने का मन बना चुका है। पिता ने बताया कि वे जल्द ही हाई कोर्ट में रिट पिटीशन दायर करने की योजना बना रहे हैं। उनका कहना है, "अब केवल न्यायालय ही हमें न्याय दिला सकता है। प्रशासन और पुलिस के ढुलमुल रवैये को देखते हुए, हमें विश्वास है कि केवल न्यायालय के आदेश के बाद ही प्रशासन जागेगा।" वे मानते हैं कि यदि गरीब परिवार की बच्ची के लापता होने पर प्रशासन इतनी लापरवाही कर सकता है, तो यह संविधान के तहत उनके अधिकारों का उल्लंघन है।
इस बीच, गुप्ता परिवार ने अब अपनी समस्या को समाचार पत्रों के माध्यम से उजागर करने का निर्णय लिया है। उनका मानना है कि मीडिया और न्यायालय का हस्तक्षेप ही प्रशासन को मजबूर करेगा कि वह इस मामले को गंभीरता से ले और बच्ची की खोजबीन में तेजी लाए। परिवार का कहना है कि प्रशासन से कोई भी मदद मिलने में उन्हें अब तक नाकामी ही हाथ लगी है और इस दौरान हर दिन उनकी बच्ची की चिंता बढ़ती जा रही है। "अगर प्रशासन सच में इस मामले को गंभीरता से लेता, तो हमारी बच्ची का पता अब तक चल चुका होता," परिवार के सदस्य कहते हैं।
गुप्ता परिवार की इस कष्टपूर्ण स्थिति से यह स्पष्ट होता है कि कैसे एक गरीब परिवार को अपनी बच्ची की गुमशुदगी के मामले में न्याय पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है, और जब तक न्यायालय और मीडिया का हस्तक्षेप नहीं होता, तब तक प्रशासन शायद इस मामले में कदम नहीं उठाएगा। अब यह देखना है कि क्या न्यायालय की शरण में जाने के बाद प्रशासन इस मामले में क्या कदम उठाता है और गुमशुदा बच्ची को ढूंढने के लिए क्या कार्यवाही करता है। गुप्ता परिवार की कहानी इस बात की गवाह है कि कैसे एक गरीब परिवार को अपनी बेटी के खो जाने के बाद न्याय पाने के लिए कितने संघर्षों का सामना करना पड़ता है।


