शिक्षा का निजीकरण: समाज सेवा से व्यापार तक का सफर वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर एक चिंतन
विंध्य वसुंधरा समाचार
भारत में शिक्षा का क्षेत्र जो कभी समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण का आधार माना जाता था, आज धीरे-धीरे एक कुटीर और लघु उद्योग का रूप लेता जा रहा है। यह बदलाव देश के भविष्य के लिए गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। सरकारी शासकीय विद्यालयों की गिरती स्थिति और निजी स्कूलों की बढ़ती संख्या इस बदलाव का स्पष्ट प्रमाण है। विशेष रूप से मध्य प्रदेश के रीवा जिले और मऊगंज क्षेत्र में यह स्थिति और भी अधिक चिंताजनक है।
सरकारी विद्यालयों की गिरती स्थिति
रीवा जिले और मऊगंज क्षेत्र में प्राथमिक और माध्यमिक शालाएं सुविधाओं के अभाव में बंद होने की कगार पर हैं। शासकीय विद्यालयों में मूलभूत सुविधाओं का घोर अभाव देखने को मिलता है। शौचालयों में ताले लगे होते हैं, पानी की टंकियां सूखी रहती हैं, और कई स्कूलों में तो प्रयोगशालाओं का नामोनिशान तक नहीं है। रिकॉर्ड में ये सुविधाएं मौजूद जरूर दिखाई देती हैं, लेकिन वास्तविकता में स्थिति विपरीत है।
सरकारी स्कूलों की स्थिति में सुधार के लिए सरकार द्वारा योजनाएं चलाई जाती हैं, लेकिन उनका लाभ छात्रों तक नहीं पहुंच पाता। उदाहरण के लिए, रीवा जिले के कई स्कूलों में "अटल टिंकरिंग लैब" के तहत 12 से 20 लाख रुपये तक की राशि आवंटित की गई थी। लेकिन भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी के कारण ये राशि प्रयोगशालाओं के विकास में नहीं लग पाई।
निजी स्कूलों का बढ़ता वर्चस्व
सरकारी स्कूलों की बिगड़ती हालत के चलते अभिभावक मजबूर होकर अपने बच्चों को महंगे निजी स्कूलों में भेजने लगे हैं। निजी स्कूलों में फीस के नाम पर अभिभावकों से भारी रकम वसूली जाती है, जिससे मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ता जा रहा है।
ग्रामीण इलाकों में भी निजी स्कूलों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इन स्कूलों में शिक्षक बहुत ही कम वेतन पर काम कर रहे हैं, जिससे शिक्षण गुणवत्ता पर नकारात्मक असर पड़ता है। वहीं, कक्षा 9वीं से 12वीं तक प्रायोगिक कार्य लगभग न के बराबर हो गया है।
पूर्व प्रधानमंत्री की सोच और वर्तमान स्थिति
भारत के एक पूर्व प्रधानमंत्री ने कल्पना की थी कि देश में केवल शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय निशुल्क कर दिए जाएं तो भारत एक सशक्त राष्ट्र बन सकता है। लेकिन वर्तमान सरकारें इन तीनों महत्वपूर्ण क्षेत्रों की उपेक्षा कर रही हैं। शिक्षा महंगी हो गई है, स्वास्थ्य उद्योग का रूप ले चुका है, और न्याय प्रणाली आम आदमी की पहुंच से दूर हो गई है।
राजनेता और सरकारी अधिकारी अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ाते। वे निजी स्कूलों में बच्चों को भेजते हैं, जिससे यह साफ हो जाता है कि वे खुद सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर भरोसा नहीं करते।
जनता पर बढ़ता कर भार
सरकारें जनता को मुफ्त सुविधाओं का लालच देकर सत्ता में आती हैं, लेकिन इन योजनाओं का खर्च जनता के टैक्स से ही पूरा किया जाता है। चाहे एक गरीब मजदूर हो या आम नागरिक, हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में टैक्स चुका रहा है। लेकिन इन करों का सही उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय व्यवस्था में सुधार पर नहीं हो रहा।
भविष्य की राह
अब समय आ गया है कि सरकारें शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय को प्राथमिकता दें। शिक्षा व्यवस्था को उद्योगपतियों के हाथों से निकालकर समाज सेवा का माध्यम बनाना जरूरी है। निजी स्कूलों पर नियंत्रण और सरकारी स्कूलों की स्थिति में सुधार लाना समय की मांग है।
जनता को भी अब जागरूक होकर अपने अधिकारों के लिए आवाज उठानी होगी। शिक्षा केवल अमीरों का अधिकार न बने, बल्कि हर वर्ग तक समान रूप से पहुंचे। सरकार को शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे ताकि देश का भविष्य उज्ज्वल और सुरक्षित बन सके।


