धान खरीदी में घोटाला: भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ी किसान की मेहनत
रीवा और मऊगंज में धान खरीदी में गड़बड़ियों का खुलासा
मध्य प्रदेश के रीवा और मऊगंज जिलों में धान खरीदी के नाम पर व्यापक भ्रष्टाचार और अनियमितताओं का बड़ा मामला सामने आ रहा है। वर्ष 2025-26 की धान खरीदी में पहले के वर्षों की तरह इस बार भी खरीदी केंद्रों पर धांधली और गड़बड़ी के गंभीर आरोप लगे हैं।
काल्पनिक पंजीयन से लेकर वेयरहाउस में गड़बड़ी तक
1. फर्जी पंजीयन और काल्पनिक धान खरीदी:
खरीदी केंद्रों के प्रभारियों और संबंधित अधिकारियों ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर हजारों कुंतल काल्पनिक धान की खरीदी कर सरकारी अभिलेखों में दर्ज कर दी।
कई ऐसे नाम पंजीयन में जोड़े गए हैं जिनके पास खेती योग्य भूमि ही नहीं है, लेकिन उनके नाम से भारी मात्रा में धान खरीदी दिखाई गई।
2. यूपी की धान एमपी में खपाई गई:
उत्तर प्रदेश से सस्ते दाम पर धान मंगवाकर मध्य प्रदेश के रीवा और मऊगंज जिलों के खरीदी केंद्रों पर ऊंचे दाम पर बेचा गया।
सरकारी रिकॉर्ड में इस धान को स्थानीय किसानों का बताकर पंजीकृत किया गया।
3. भंडारण में गड़बड़ी:
सरकारी और निजी वेयरहाउस में धान का भंडारण भी संदिग्ध है।
बड़े सफेदपोश नेताओं और अधिकारियों के निजी गोदामों में भारी मात्रा में धान जमा है, जिसकी कोई पारदर्शी जांच नहीं हो रही है।
प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार का जाल
1. जांच एजेंसियों की मिलीभगत:
सहकारी समितियों, कृषि विभाग, सहकारी बैंक, और अन्य विभागों के अधिकारी एक-दूसरे की जांच कर भ्रष्टाचार को ढकने का काम कर रहे हैं।
खरीदी केंद्रों पर शिकायतों के बावजूद तहसीलदार, सहकारी विभाग और अन्य संबंधित अधिकारी ठोस कार्रवाई नहीं कर रहे हैं।
2. सेवा शुल्क के नाम पर वसूली:
खरीद केंद्रों पर प्रति कुंतल धान पर ₹20 से ₹25 सेवा शुल्क के नाम पर अवैध वसूली की जा रही है।
यदि कोई किसान या व्यापारी यह राशि नहीं देता, तो उसके खिलाफ फर्जी आरोप लगाए जाते हैं।
3. रिकॉर्ड में हेराफेरी:
खरीदी केंद्रों पर शुरू में धान की कमी दर्ज की जाती है, जिसे बाद में मोटी रकम लेकर रिकॉर्ड में पूरा दिखाया जाता है।
यह खेल कई वर्षों से चला आ रहा है, जिसमें बिचौलिए, किसान और प्रशासनिक अधिकारी बराबर के हिस्सेदार हैं।
राजनीतिक संरक्षण और मिलीभगत
1. सत्ता और विपक्ष दोनों का गठजोड़:
इस घोटाले में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों दलों के नेता और उनके कार्यकर्ता शामिल हैं।
दोनों दलों के नेताओं के वेयरहाउस में अवैध रूप से धान रखा गया है, जिससे न तो विपक्ष आवाज उठा रहा है और न ही सत्ता पक्ष।
2. प्रशासनिक मजबूरी:
जिला प्रशासन सफेदपोश नेताओं और प्रभावशाली लोगों के दबाव में आकर केवल दिखावटी कार्रवाई कर रहा है।
वास्तविक दोषियों तक पहुंचना प्रशासन के लिए संभव नहीं हो पा रहा है।
किसानों की बदहाली
1. छोटे किसानों का शोषण:
छोटे और वास्तविक किसान खरीदी केंद्रों पर अपनी उपज बेचने के लिए परेशान हो रहे हैं।
उनका धान नहीं खरीदा जा रहा या देरी से खरीदा जा रहा है, जबकि बड़े किसानों और दलालों का धान प्राथमिकता से खरीदा जाता है।
2. फर्जी किसान पंजीयन:
कई गैर-किसानों के नाम पर पंजीयन कर लाखों-करोड़ों का धान खरीदा गया है।
जिन किसानों के पास वास्तविक जमीन है, वे खरीदी केंद्रों पर धक्के खा रहे हैं।
समस्या का समाधान और आवश्यक कदम
1. पारदर्शी जांच और कार्रवाई:
राज्य सरकार को उच्च स्तरीय समिति गठित कर खरीदी केंद्रों की गहन जांच करानी चाहिए।
दोषी अधिकारियों, कर्मचारियों और नेताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
2. डिजिटल पंजीयन और निगरानी:
किसानों का पंजीयन डिजिटल माध्यम से आधार और भूमि रिकॉर्ड से जोड़कर किया जाए।
खरीदी प्रक्रिया की निगरानी के लिए लाइव सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं।
3. सामाजिक सहभागिता:
सामाजिक कार्यकर्ताओं और गैर-सरकारी संगठनों को खरीदी प्रक्रिया की निगरानी का अधिकार दिया जाए।
किसानों की शिकायतों के त्वरित समाधान के लिए विशेष हेल्पलाइन शुरू की जाए।
4. राजनीतिक हस्तक्षेप पर रोक:
नेताओं और राजनीतिक दलों के प्रभाव से प्रशासनिक कार्यों को मुक्त किया जाए।
खरीदी प्रक्रिया में किसी भी प्रकार का राजनीतिक हस्तक्षेप पूरी तरह से रोका जाए।
धान खरीदी में हो रहे भ्रष्टाचार ने किसानों की मेहनत पर पानी फेर दिया है। यह समस्या केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक भी है। अगर समय रहते इस पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह घोटाला और विकराल रूप ले सकता है।

