निशुल्क खाद्यान्न वितरण योजना में बड़ा घोटाला!
रीवा जिले में लाखों का अनाज बाजार में बिकने का आरोप, प्रशासनिक जांच की मांग
रीवा। मध्य प्रदेश में सरकार द्वारा गरीबों को राहत देने के उद्देश्य से संचालित निशुल्क खाद्यान्न वितरण योजना में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं के आरोप सामने आ रहे हैं। सरकार द्वारा उचित मूल्य की दुकानों (राशन दुकानों) से पात्र हितग्राहियों को निशुल्क राशन वितरित किया जाता है, लेकिन हकीकत में यह योजना भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती नजर आ रही है।
31 मार्च तक केवाईसी सत्यापन अनिवार्य
मध्य प्रदेश सरकार ने सभी उचित मूल्य की दुकानों के माध्यम से राशन वितरण में पारदर्शिता लाने के लिए हितग्राहियों के केवाईसी सत्यापन की अंतिम तिथि 31 मार्च निर्धारित की है। इसका उद्देश्य अपात्र व्यक्तियों को राशन प्राप्त करने से रोकना और वास्तविक पात्र लाभार्थियों को योजना का लाभ दिलाना है।
लेकिन रीवा जिले, मऊगंज, गढ़, हनुमना और अन्य तहसीलों में उचित मूल्य की दुकानों पर बड़े पैमाने पर गड़बड़ियों की शिकायतें मिल रही हैं। सूत्रों के अनुसार, अपात्र व्यक्तियों को राशन मिल रहा है, जबकि वास्तविक लाभार्थी वंचित रह रहे हैं।
खाद्यान्न की जमाखोरी और अवैध बिक्री का खेल
जिले में लाखों रुपये मूल्य के खाद्यान्न की कालाबाजारी हो रही है। जिन गरीबों के लिए यह राशन निशुल्क दिया जाना है, वह बाजार में ऊंचे दामों पर बेचा जा रहा है। कुछ दुकानदार अपात्र व्यक्तियों से सांठगांठ कर अनाज की जमाखोरी कर रहे हैं और खुले बाजार में ऊंचे दामों पर बेच रहे हैं।
बैंक रिकॉर्ड में भी गड़बड़ियों की संभावना
सूत्रों के अनुसार, जिला सहकारी केंद्रीय बैंक, रीवा के अभिलेखों का यदि 31 मार्च से पहले मिलान किया जाए, तो अनियमितताओं का बड़ा खुलासा हो सकता है।
पहले, जब खाद्यान्न की कीमत 1 रुपये प्रति किलो थी, तब लाखों रुपये की राशि मार्च माह में जमा होती थी।
अब, जब यह योजना निशुल्क हो गई है, तो इन राशियों का कोई लेखा-जोखा नहीं मिल रहा।
ऐसे में खाद्यान्न की बिक्री और उसकी राशि की जांच आवश्यक हो जाती है।
गैर-योग्य व्यक्तियों के नाम पर दुकानें!
अनेक उचित मूल्य की दुकानें ऐसे व्यक्तियों के नाम पर हैं जो खुद पढ़-लिख नहीं सकते, मशीन नहीं चला सकते, और जिनका कोई प्रशासनिक ज्ञान नहीं है।
ऐसे विक्रेता कमीशन के लालच में अपनी दुकानें अन्य लोगों को सौंपकर व्यापार करवा रहे हैं।
प्राइवेट व्यक्तियों को 6,000 से 7,000 रुपये महीना देकर दुकानों का संचालन कराया जा रहा है।
खाद्यान्न की घटतौली आम बात हो गई है – 50 किलो के बोरे में 2 से 4 किलो तक राशन कम दिया जा रहा है।
प्रशासनिक अधिकारियों और नेताओं की मिलीभगत का आरोप
स्थानीय जनता का आरोप है कि इस भ्रष्टाचार में प्रशासनिक अधिकारी, सहकारी समिति के प्रबंधक और जनप्रतिनिधि भी शामिल हैं।
संबंधित विभागों द्वारा उचित मूल्य की दुकानों का नियमित निरीक्षण नहीं किया जाता।
बड़े पैमाने पर फर्जी राशन कार्ड बनाए गए हैं और अपात्र लोगों को खाद्यान्न दिया जा रहा है।
गरीबी रेखा से नीचे (BPL) सूची में शामिल कई परिवार महंगी गाड़ियां खरीद रहे हैं, जिससे साफ पता चलता है कि उन्हें अनुचित लाभ मिल रहा है।
तहसील और राजस्व विभाग की पिछली जांच भी हुई ठंडे बस्ते में
पहले भी कुछ उचित मूल्य की दुकानों की जांच हुई थी, लेकिन उचित कार्रवाई नहीं हुई। अगर इस बार भी प्रशासन ने लापरवाही बरती, तो यह घोटाला और बढ़ सकता है।
क्या होना चाहिए?
1. सभी उचित मूल्य की दुकानों का गहन निरीक्षण किया जाए।
2. बैंक अभिलेखों की जांच कर अपात्र व्यक्तियों की पहचान की जाए।
3. राशन की कालाबाजारी रोकने के लिए उचित मूल्य की दुकानों पर CCTV कैमरे अनिवार्य किए जाएं।
4. घटतौली करने वाले दुकानदारों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो।
5. संबंधित राजस्व अधिकारियों और तहसीलदारों द्वारा हर दुकान का नियमित सत्यापन किया जाए।
क्या प्रशासन इस पर सख्त कदम उठाएगा?
अब देखना यह होगा कि संभागीय आयुक्त, जिला कलेक्टर और अन्य प्रशासनिक अधिकारी इस भ्रष्टाचार के खिलाफ क्या कार्रवाई करते हैं। क्या वे इस बड़े घोटाले का पर्दाफाश करेंगे या फिर यह मामला भी ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?
यदि समय रहते सख्त जांच और कार्यवाही नहीं हुई, तो आने वाले समय में सहकारी समितियां और उचित मूल्य की दुकानें दिवालिया हो सकती हैं, और गरीबों के हक का अनाज खुले बाजार में बिकता रहेगा।




