रीवा संभाग में खरीदी केंद्रों के निर्धारण पर उठे सवाल, अनियमितताओं की आशंका
विंध्य वसुंधरा समाचार रीवा मऊगंज मध्यप्रदेश
कई समितियों पर भ्रष्टाचार के आरोप, फिर भी मिली खरीदी केंद्रों की जिम्मेदारी तहसीलों और गांवों के नामों में गड़बड़ी, किसानों को होगी परेशानी प्रशासनिक लापरवाही के चलते पारदर्शिता पर गंभीर सवाल
रीवा। रीवा संभाग में, गेहूं, मसूर, चना और राय की खरीदी के लिए बनाए गए केंद्रों को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। प्रशासन द्वारा जारी सूची में गंभीर अनियमितताओं की आशंका जताई जा रही है। कई खरीदी केंद्रों का निर्धारण इस तरह से किया गया है कि किसानों को अनावश्यक परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। वहीं, कुछ ऐसे सहकारी समितियों को भी खरीदी केंद्र बनाया गया है, जिन पर पहले से ही वित्तीय गड़बड़ियों और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हुए हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या प्रशासन ने इन समितियों की जांच किए बिना ही उन्हें फिर से खरीदी केंद्र बनाने का फैसला कर लिया?
तहसीलों और गांवों में गड़बड़ी, किसानों में असमंजस
खरीदी केंद्रों की जारी सूची में तहसीलों और गांवों के नामों में भी भारी गड़बड़ी देखने को मिल रही है। कई खरीदी केंद्र ऐसे स्थानों पर बनाए गए हैं जो उनकी संबंधित तहसील में नहीं आते, जिससे किसानों को भ्रम और असुविधा होगी। इसके अलावा, कुछ स्थानों पर महज 3-4 किलोमीटर की दूरी पर एक से अधिक खरीदी केंद्र बनाए गए हैं, जबकि कुछ गांवों के किसानों को 10-12 किलोमीटर की दूरी तय करनी होगी। यह असंतुलन बताता है कि खरीदी केंद्रों के निर्धारण में न तो किसानों की सुविधा का ध्यान रखा गया और न ही किसी ठोस मानक का पालन किया गया।
भ्रष्टाचार के आरोप झेल रहीं समितियां फिर बनीं खरीदी केंद्र
खरीदी केंद्रों की सूची में सबसे गंभीर चिंता यह है कि कुछ सहकारी समितियों को फिर से खरीदी केंद्र बना दिया गया है, जिन पर पहले ही अनाज गबन, रिकॉर्ड में हेरफेर और वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगे हुए हैं। सूत्रों के अनुसार, कई समितियों के प्रबंधकों पर मनमानी और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं, फिर भी उन्हें खरीदी केंद्रों की जिम्मेदारी दी गई है। कई समितियों के पिछले वर्षों के रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं, फिर भी प्रशासन ने बिना जांच के उन्हें सूची में शामिल कर लिया। कुछ सहकारी समितियां पहले ही आर्थिक अनियमितताओं के कारण चर्चा में रही हैं, लेकिन इस बार भी उन्हें खरीदी का अधिकार मिल गया। यह सवाल उठता है कि प्रशासन ने इन समितियों की पारदर्शिता की जांच किए बिना ही यह निर्णय क्यों लिया?
रिकॉर्ड संधारण में गड़बड़ी, प्रशासन ने नहीं ली सुध
कई सहकारी समितियां अपने पिछले वर्षों के रिकॉर्ड को ठीक से संधारित नहीं कर पाई हैं। समितियों में खरीदी एजेंडा रजिस्टर,हिस्सा रजिस्टर, कार्यवाही रजिस्टर और कैश बुक जैसी महत्वपूर्ण जानकारियां गायब हैं। कई समितियों ने अब तक अपने पुराने वित्तीय दस्तावेज प्रशासन को उपलब्ध नहीं कराए हैं। इसके बावजूद उन्हें खरीदी केंद्र के रूप में चयनित किया गया, जो शासन की निधि के दुरुपयोग की ओर इशारा करता है। अगर ये समितियां अपने ही रिकॉर्ड संधारित नहीं कर पा रही हैं, तो वे शासन की धनराशि और किसानों के अनाज को कैसे संभालेंगी?
प्रशासनिक लापरवाही, अधिकारी नहीं दे रहे जवाब
खरीदी केंद्रों के निर्धारण में सहकारिता विभाग, सहकारी बैंक और खाद्य विभाग की भूमिका होती है। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि इन विभागों ने बिना गहन जांच के ही सूची जारी कर दी। जब इस संबंध में अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की गई, तो या तो उन्होंने फोन नहीं उठाया या फिर संतोषजनक जवाब नहीं दिया। कुछ अधिकारियों ने इस विषय पर कोई भी आधिकारिक टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। इससे संदेह बढ़ता है कि क्या इस पूरी प्रक्रिया में जानबूझकर अनियमितताएं की गईं हैं?
एक जगह से सहकारिता विभाग के कर्मचारियों को दूसरी जगह भेज दिया जाता है जो खरीदी केंद्र में कई लाखों लाख रुपए की हेरा फेरी कर चुके है। किंतु सरकार ऐसे भ्रष्टाचारियों को क्यों नियुक्त करती है यह समझ से परे क्या ऐसे लोग दूसरी समित में अपनी सेवा देगे तो यह घोटाला नहीं करेंगे इसकी जवाबदारी क्या सरकार लेगी या जिला प्रशासन लेगा ऐसे भ्रष्ट कर्मचारियों के सख्ती से सरकार कार्यवाही करे और विशेष जांच करा करे ऐसे कर्मचारियों के कड़ी से कड़ी सजा दे। जो किसानों का हक मार रहे है। ऐसे कर्मचारी जहां भी पदस्थ थे। उस समित का दिवालिया हो चुकी है। और अब इनके नजरों में दूसरी समित है।
कलेक्टर से निष्पक्ष जांच की मांग
इन तमाम अनियमितताओं को देखते हुए यह आवश्यक हो गया है कि जिला कलेक्टर इस पूरी प्रक्रिया की गोपनीय जांच कराएं।
किसानों की मुख्य मांगें:
1. खरीदी केंद्रों के निर्धारण की पारदर्शी जांच हो।
2. भ्रष्टाचार के आरोपों वाली समितियों को खरीदी केंद्रों की सूची से हटाया जाए।
3. किसानों की सुविधा के अनुसार खरीदी केंद्रों का पुनर्निर्धारण किया जाए।
4. सभी सहकारी समितियों के पिछले वर्षों के रिकॉर्ड की जांच की जाए।
अगर प्रशासन इस ओर ध्यान नहीं देता है, तो यह किसानों के लिए परेशानी का सबब बन सकता है और भ्रष्टाचार को और बढ़ावा मिलेगा। जिला प्रशासन को जल्द से जल्द इस मामले में संज्ञान लेना चाहिए और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए।


