पति की दीर्घायु के लिए बट सावित्री व्रत: आस्था, श्रद्धा और नारी शक्ति का प्रतीक
विंध्य वसुंधरा समाचार रीवा (म.प्र.)
भारतीय संस्कृति में पतिपरायणता और नारी तप का प्रतीक व्रत बट सावित्री प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ मास की अमावस्या को मनाया जाता है। यह व्रत विशेष रूप से सुहागिन स्त्रियाँ अपने पति की दीर्घायु, आरोग्य और अखंड सौभाग्य की कामना से करती हैं। व्रत का आधार पौराणिक कथा सावित्री और सत्यवान के आदर्श प्रेम और त्याग से जुड़ा है, जहाँ सावित्री ने अपने पति को यमराज से भी छीन लिया।
वटवृक्ष: जीवन, आस्था और ब्रह्म का प्रतीक
रीवा, मध्यप्रदेश के प्रख्यात धर्माचार्य पंडित प्राणनाथ त्रिपाठी जी ने वट सावित्री व्रत और वटवृक्ष के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि—
“वटवृक्ष न केवल एक पेड़ है, अपितु यह त्रिदेवों का वास माने जाने वाला पवित्र स्थल है। इसकी जड़ों में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं में भगवान शिव का निवास माना जाता है। इस वृक्ष की पूजा कर नारी न केवल पति के लिए, बल्कि पूरे परिवार के कल्याण की कामना करती है।”
उन्होंने यह भी कहा कि सावित्री जैसी नारी शक्ति आज भी प्रेरणा का स्रोत है। यह व्रत बताता है कि यदि मन में अडिग संकल्प हो, तो मृत्यु भी मार्ग में बाधा नहीं बन सकती।
व्रत का विधिवत विधान
1. व्रत की तिथि एवं पर्व की अवधि
व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को किया जाता है।
कुछ स्थानों पर महिलाएं त्रयोदशी से अमावस्या तक तीन दिन तक व्रत करती हैं।
इस वर्ष व्रत शनिवार, रविवार और सोमवार को आने से विशेष पुण्यकारी माना जा रहा है।
2. प्रातः पूजन की तैयारी
प्रातः सूर्योदय से पूर्व स्नान करें।
पीले या लाल वस्त्र धारण करें।
मन को पवित्र और शांत रखें।
काले वस्त्र या ऐसे रंग जिनमें कालापन हो, उन्हें त्याग दें।
3. पूजन सामग्री
हल्दी, सिंदूर, पान, पुष्प, फल, गंगाजल, जल का कलश, रक्षा सूत्र (कलावा), नारियल, घी का दीपक, नेवैद्य।
वटवृक्ष की जड़ में सावित्री-सत्यवान की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर पूजन करें।
4. पूजन एवं परिक्रमा विधि
रक्षा सूत्र वटवृक्ष के चारों ओर लपेटें।
108 बार परिक्रमा करें (गर्भवती महिलाएं परिक्रमा न करें)।
व्रत कथा का श्रवण करें — जिसमें यमराज, सावित्री और सत्यवान के बीच संवाद विशेष महत्व रखता है।
अखंड दीपक जलाएं और संकल्पपूर्वक व्रत का पालन करें।
गर्भवती महिलाओं के लिए विशेष निर्देश
पंडित प्राणनाथ त्रिपाठी जी ने बताया कि गर्भवती स्त्रियाँ भी यह व्रत कर सकती हैं परंतु उनके लिए कुछ नियमों में ढील दी गई है—
निर्जल व्रत न रखें, बीच-बीच में जल ग्रहण करें।
लंबी परिक्रमा और देर तक खड़े रहना टालें।
पूजा एवं मानसिक ध्यान द्वारा भी व्रत को पूर्ण किया जा सकता है।
सोलह शृंगार का महत्व
व्रत के दिन सोलह शृंगार करना स्त्री के सौभाग्य की रक्षा और वृद्धि का प्रतीक है।
चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, मांगटीका, नथ, पायल, बिछिया, काजल आदि का शृंगार करें।
बालों में फूल लगाना शुभ माना गया है।
शृंगार सौंदर्य का नहीं, बल्कि सौभाग्य और श्रद्धा का प्रतीक है।
ब्रह्मचर्य और आत्मसंयम
व्रत के तीन दिनों तक संयम, ब्रह्मचर्य और सात्विक जीवन का पालन किया जाता है।
झूठ, कटु वचन, कलह, अपवित्र भोजन आदि से बचाव जरूरी है।
भगवान विष्णु, यमराज, सावित्री-सत्यवान का ध्यान करें।
नारी शक्ति की प्रेरणा
बट सावित्री व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय स्त्री की श्रद्धा, शक्ति, और अडिग निष्ठा का प्रतीक है। यह व्रत प्रत्येक स्त्री को यह प्रेरणा देता है कि वह चाहे तो अपने संकल्प से मृत्युलोक में भी जीवन का संचार कर सकती है।




