क्या मध्यप्रदेश की पुलिस अब नियंत्रण से बाहर है? कटनी कांड से भिंड तक गूंजता सवाल
डीएसपी ख्याति मिश्रा का हाई प्रोफाइल विवाद, पत्रकारों से दुर्व्यवहार और अब मुख्यमंत्री की सख्त कार्रवाई — क्या यह प्रशासन की जवाबदेही की नई शुरुआत है?
भोपाल/कटनी/भिंड।
वह दिन जब 2016 का था परिवार सगे संबंधियों रीवा जनमानस में खुशी का ठिकाना नहीं था। जहां वर्तमान मऊगंज जिले से एक ही घर से 3 लोगों ने अधिकारी बने SDM तहसीलदार CSP बने जब यह कटनी की पुलिस अधिकारी के सामने पिता पुत्र सगे संबंधियों को पुलिस द्वारा पिता गया। जिसमें रीवा मऊगंज की जनता स्तंभ है।
मध्यप्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक बड़ा मंथन चल रहा है — क्या अब पुलिस और प्रशासनिक अफसर जनता के प्रति नहीं, बल्कि केवल सत्ता के प्रति जवाबदेह रह गए हैं?
यह सवाल तब और गंभीर हो जाता है जब उच्च पदस्थ पुलिस अधिकारियों पर नैतिक पतन, दुराचार, लोकसेवा के प्रति असंवेदनशीलता जैसे आरोप सार्वजनिक मंचों और मीडिया की सुर्खियों में हों।
कटनी का हाई प्रोफाइल फैमिली ड्रामा : आईपीएस गरिमा पर सवाल
कटनी में डीएसपी ख्याति मिश्रा और पुलिस अधीक्षक अभिजीत रंजन के बीच का विवाद अब एक व्यक्तिगत मुद्दा न रहकर पूरे पुलिस विभाग की छवि पर प्रश्नचिन्ह बन गया है।
ख्याति मिश्रा का आरोप है कि उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया, उनके निजी जीवन में हस्तक्षेप हुआ और विभागीय संरचना के नाम पर पक्षपात किया गया।
वहीं तहसीलदार शैलेंद्र बिहार ने भी कटनी एसपी पर गंभीर प्रशासनिक दखल और उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं।
डीएसपी के परिजनों को पुलिस द्वारा रोके जाने और वायरल ऑडियो में कथित दुर्व्यवहार की बात ने पूरे राज्य को स्तब्ध कर दिया।
जनता के बीच घटती पुलिस की विश्वसनीयता
इस पूरे घटनाक्रम में जो सबसे बड़ी क्षति हुई है, वह है — पुलिस की आम जनता के बीच विश्वसनीयता।
एक तरफ पुलिस अफसर खुद अपनी निजी जिंदगी को सार्वजनिक कर रहे हैं, दूसरी ओर आम नागरिक के लिए न्याय पाना अब संघर्ष बन गया है।
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने की कड़ी कार्रवाई, कटनी व दतिया के पुलिस अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से हटाया
कटनी मामले में जनता और मीडिया की तीव्र प्रतिक्रिया के बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने निर्णायक रुख अपनाते हुए कटनी के पुलिस अधीक्षक, दतिया के पुलिस अधीक्षक, आईजी चंबल रेंज और डीआईजी को तत्काल प्रभाव से हटाने के निर्देश जारी कर दिए।
मुख्यमंत्री ने अपने आधिकारिक बयान में स्पष्ट कहा:
“कटनी के पुलिस अधीक्षक और दतिया के पुलिस अधीक्षक तथा आईजी, डीआईजी चंबल रेंज द्वारा ऐसा व्यवहार किया गया जो लोकसेवा की मर्यादा के प्रतिकूल है और जनभावनाओं को आहत करता है। अतः इन्हें तत्काल प्रभाव से हटाने के निर्देश दिए गए हैं।”
यह कदम न केवल प्रशासनिक अनुशासन की पुनर्स्थापना का संकेत है, बल्कि यह दर्शाता है कि सरकार अब जनता के धैर्य की परीक्षा नहीं लेना चाहती।
भिंड की घटना : लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर हमला
कटनी के बाद सबसे चिंताजनक घटना ग्वालियर संभाग के भिंड में सामने आई, जहां पत्रकारों से पुलिस ने कथित रूप से अभद्रता, दुव्यवहार और धमकी भरा व्यवहार किया।
यह न सिर्फ प्रेस की स्वतंत्रता के खिलाफ है, बल्कि संविधान के मूल आदर्शों पर सीधा आघात भी है।
कठोर प्रश्न : क्या यह शासन सनातन आदर्शों के अनुसार चल रहा है?
यदि कोई महिला अधिकारी अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाए, तो वह “छवि बिगाड़ने” की दोषी मानी जाती है।
यदि कोई तहसीलदार न्याय मांगता है, तो उस पर ही अनुशासनहीनता का आरोप लग जाता है।
और यदि कोई पत्रकार सवाल करता है, तो उसकी स्वतंत्रता पर हमला किया जाता है।
क्या यही है “हिंदू हृदय सम्राट” की परिकल्पना?
क्या यह “सनातन नीति” है जिसमें अधिकार मांगने वाला दोषी बन जाता है?
यदि आरोप झूठे हैं, तो कार्रवाई हो — यदि सही हैं, तो न्याय मिले
लोकतंत्र में न्याय और दंड का संतुलन जरूरी है।
यदि डीएसपी, तहसीलदार या पत्रकार गलत हैं, तो उनके विरुद्ध सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन अगर वे सही हैं, तो उनकी आवाज दबाना अपराध से कम नहीं होगा।
अब चुप रहना अपराध है
कटनी से भिंड तक उठी आवाज़ें केवल स्थानीय घटनाएं नहीं हैं — ये उस लोकतांत्रिक चेतना की पुकार हैं जो एक न्यायप्रिय समाज की नींव होती हैं।



