रीवा-मऊगंज में बहरूपिया पत्रकारिता का बोलबाला — जिला प्रशासन मौन, जनता का भरोसा खतरे में
विंध्य वसुंधरा समाचार, की विशेष रिपोर्ट रीवा/मऊगंज।
रीवा और मऊगंज जिले में इन दिनों पत्रकारिता का स्वरूप गंभीर सवालों के घेरे में है। वह पत्रकारिता, जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, आज कई जगहों पर अपनी गरिमा और विश्वसनीयता खो चुकी है। समाज के हित में सत्य और निष्पक्षता को केंद्र में रखने वाली पत्रकारिता अब कुछ बहरूपियों के हाथों ब्लैकमेलिंग और निजी स्वार्थ का हथियार बन गई है।
नारद और सरस्वती की परंपरा को ठेस
भारत के पत्रकारिता इतिहास में पत्रकारों को नारद और सरस्वती का वंशज कहा जाता है। इसका आशय यह है कि पत्रकार को ज्ञान, विवेक और सच का संदेशवाहक होना चाहिए। लेकिन आज कुछ लोग इस परंपरा का मज़ाक उड़ाते हुए पत्रकारिता का नाम लेकर आपराधिक प्रवृत्तियों में लिप्त हैं।
2010-2015 में भी ऐसा पतन नहीं
स्थानीय वरिष्ठ नागरिक बताते हैं कि सन 2010 से 2015 के बीच भी पत्रकारिता में वैचारिक मतभेद और पक्षपात होते थे, लेकिन इतनी गंदगी, व्यक्तिगत चरित्र हनन और ठेकेदार-राजनेता गठजोड़ वाली पत्रकारिता पहले कभी नहीं देखी गई। वर्तमान स्थिति को पत्रकारिता का ‘काला दौर’ कहा जा रहा है।
राजनेताओं और ठेकेदारों के पिछलग्गू
जनचर्चा के अनुसार, कई तथाकथित पत्रकार आज अपने कैमरे और माइक्रोफोन का इस्तेमाल सच दिखाने के बजाय राजनेताओं और ठेकेदारों के प्रचार में कर रहे हैं। बदले में उन्हें आर्थिक लाभ, ठेके, या अन्य सुविधाएं मिल रही हैं। यह सीधे-सीधे पत्रकारिता के धर्म और नैतिकता के खिलाफ है।
ब्लैकमेलिंग का अड्डा
सूत्रों के अनुसार, कुछ लोग समाचार चैनल या पोर्टल का नाम लेकर व्यवसायियों, सरकारी अधिकारियों और ठेकेदारों से वसूली कर रहे हैं। जो पैसा नहीं देता, उसके खिलाफ बिना ठोस सबूत के नकारात्मक खबरें चला दी जाती हैं, जिससे उसकी सामाजिक छवि धूमिल होती है।
प्रशासन की कुंभकर्णी नींद
जिला प्रशासन और पुलिस के पास इन शिकायतों की भरमार है, लेकिन अब तक किसी बड़े बहरूपिए पत्रकार के खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं हुई। इससे यह संदेश जा रहा है कि प्रशासन या तो इन पर हाथ डालना नहीं चाहता, या किसी दबाव में है।
कानून है स्पष्ट
भारतीय कानून में स्पष्ट प्रावधान है कि किसी व्यक्ति की छवि को बिना प्रमाण खराब करना मानहानि और आईटी एक्ट के तहत दंडनीय अपराध है। लेकिन जब आरोपी ‘पत्रकार’ के नाम का कवच पहन लेता है, तो अक्सर पीड़ित लोग डर के मारे खुलकर शिकायत भी नहीं करते।
न्यायालय की शरण ही विकल्प
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी को वास्तव में किसी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ आरोप लगाने हैं, तो उन्हें न्यायालय की शरण लेनी चाहिए। बिना कोर्ट की अनुमति के, मीडिया में आरोप प्रसारित करना गैरकानूनी है और सजा का आधार बन सकता है।
जनता का भरोसा डगमगाया
रीवा और मऊगंज में आम जनता का भरोसा पत्रकारिता से डगमगाने लगा है। लोग कहते हैं कि अब खबर देखकर यह समझना मुश्किल हो गया है कि वह जनहित में है या किसी के इशारे पर चलाई जा रही है।
प्रबुद्ध वर्ग में आक्रोश
सामाजिक कार्यकर्ताओं, अधिवक्ताओं और शिक्षाविदों का कहना है कि यदि ऐसे बहरूपिए पत्रकारों पर जल्द कार्रवाई नहीं हुई, तो पत्रकारिता की साख पूरी तरह खत्म हो जाएगी।
प्रशासन से 3 बड़ी मांगें
1. फर्जी और ब्लैकमेलिंग करने वाले पत्रकारों की सूची बनाकर उनका लाइसेंस/प्रेस कार्ड रद्द किया जाए।
2. आईटी एक्ट, मानहानि और धोखाधड़ी की धाराओं में तत्काल गिरफ्तारी हो।
3. पत्रकारिता संस्थाओं और प्रेस क्लबों का स्वतंत्र ऑडिट और जांच हो।
पुराने मामलों की जांच
स्थानीय नागरिकों का सुझाव है कि पिछले 10 वर्षों में ऐसे पत्रकारों के खिलाफ आई सभी शिकायतों की पुनः जांच की जाए, ताकि पीड़ितों को न्याय मिल सके और गुनहगारों को सजा।
पत्रकारिता की गरिमा बचाना जरूरी
पत्रकारिता का मकसद सत्ता से सवाल करना और जनता की आवाज़ बनना है। लेकिन जब पत्रकार खुद सत्ता और ठेकेदारों के हाथ की कठपुतली बन जाए, तो लोकतंत्र के लिए यह खतरनाक संकेत है।
प्रशासन को दिखानी होगी सख्ती
विशेषज्ञों का कहना है कि जिला कलेक्टर और संभागीय आयुक्त को इस मुद्दे पर व्यक्तिगत रूप से पहल करनी होगी। यदि अभी कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाले वर्षों में यह प्रवृत्ति और मजबूत हो जाएगी।
मीडिया हाउसों की भी जिम्मेदारी
स्थानीय मीडिया हाउसों और चैनल मालिकों को भी चाहिए कि वे अपने संस्थान से जुड़े ऐसे लोगों को तत्काल बाहर करें, जो पत्रकारिता की आड़ में आपराधिक गतिविधियों में लिप्त हैं।
जनता की चेतावनी
कुछ सामाजिक संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि प्रशासन ने 30 दिनों के भीतर ठोस कदम नहीं उठाए, तो वे सामूहिक आंदोलन करेंगे और इसकी जिम्मेदारी प्रशासन की होगी
नैतिकता की वापसी जरूरी
पत्रकारिता को फिर से उसकी नैतिक जड़ों से जोड़ना होगा। इसके लिए ईमानदार पत्रकारों, समाज के प्रबुद्ध वर्ग और जागरूक जनता को एकजुट होकर आवाज़ उठानी होगी।
कानून से बचना अब मुश्किल होगा
आईटी एक्ट और मानहानि कानून में हाल के संशोधन ऐसे लोगों पर सीधी कार्रवाई का रास्ता खोलते हैं। यदि पुलिस और प्रशासन चाहे, तो 24 घंटे में गिरफ्तारी संभव है।

