रक्षाबंधन की रौनक में मिलावटखोरों का खेल रीवा-मऊगंज में खाद्य विभाग की निष्क्रियता से स्वास्थ्य पर संकट
पवित्र पर्व पर करोड़ों रुपये की घटिया व मिलावटी मिठाइयों की बिक्री, प्रशासन ने नहीं ली सुध
विंध्य वसुंधरा समाचार, रीवा/मऊगंज।
सनातन धर्म का पावन रक्षाबंधन पर्व इस वर्ष पूरे देश में उल्लास, श्रद्धा और पारिवारिक प्रेम के भाव के साथ मनाया गया। शहर से लेकर दूरदराज़ ग्रामीण अंचलों तक बाजारों में सुबह से ही भारी भीड़ देखने को मिली। बहनों ने अपने भाइयों की कलाई पर बांधने के लिए रंग-बिरंगे रक्षा सूत्र, पारंपरिक राखियाँ और सजावटी कंगन खरीदे। मिठाई, कपड़े, श्रृंगार सामग्री और उपहार की दुकानों पर ग्राहकों की भीड़ इतनी थी कि पैदल चलना भी मुश्किल हो गया।
रीवा और मऊगंज के प्रमुख बाजारों—सिविल लाइन, चौपाटी, बिछिया, मऊगंज बस स्टैंड और आसपास के ग्रामीण हाट-बाज़ारों में कारोबारियों की बिक्री कई गुना बढ़ी। सर्वाधिक खरीदारी मिठाइयों और सजावटी राखियों की हुई। दुकानदारों ने इस मौके पर खास ऑफर और पैकेज भी पेश किए, जिससे त्योहार का उत्साह और बढ़ गया।
खुशियों के बीच कड़वी सच्चाई — मिलावट का जाल
त्योहार की रौनक के बीच एक चिंताजनक स्थिति भी सामने आई। रक्षाबंधन जैसे पवित्र पर्व पर भी खाद्य सुरक्षा विभाग की निष्क्रियता का फायदा उठाकर मिलावटखोर सक्रिय हो गए। करोड़ों रुपये की मिठाइयाँ, नमकीन, दूध से बने उत्पाद और स्नैक्स खुलेआम बेचे गए, जिनकी गुणवत्ता की जांच तक नहीं की गई।
कई जगहों पर दुकानों में मिठाई खुले में पड़ी रही, जिन पर मक्खियाँ और धूल जमी हुई थी। दूध और मावे के उत्पादों में कृत्रिम रंग, सिंथेटिक फ्लेवर और सस्ते वनस्पति घी का इस्तेमाल किया गया। पुराने और बासी स्टॉक को नए पैक में भरकर बेचने की शिकायतें भी मिलीं।
विभाग की चुप्पी से बढ़े मिलावटखोरों के हौसले
सामान्यतः त्योहारों के दौरान खाद्य विभाग द्वारा बाजार में सैंपलिंग और छापेमारी की जाती है, लेकिन इस बार न तो कोई बड़ी जांच हुई और न ही सख्त कार्रवाई की खबर आई। ग्रामीण क्षेत्रों में तो स्थिति और भी गंभीर रही, जहाँ पूरी तरह से निगरानी का अभाव दिखा।
स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा
चिकित्सकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि घटिया व मिलावटी मिठाइयाँ पाचन तंत्र को नुकसान पहुंचाती हैं और फूड पॉइजनिंग, लीवर-किडनी की बीमारी, एलर्जी व बच्चों में गंभीर संक्रमण का कारण बन सकती हैं। बुजुर्ग और बच्चे इसके प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील होते हैं।

