Breaking: “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति” – एक ही सत्य को ज्ञानी करते हैं अनेक रूपों में वर्णन
मंगलाचरण से प्रसन्न होती हैं ब्रह्मांड की समस्त शक्तियां | 2 सितम्बर को विशाल भंडारे के साथ होगा भागवत महायज्ञ का समापन
श्री शारदा देवी मंदिर प्रांगण, हिनौती (चियार) में चल रहा साप्ताहिक श्रीमद्भागवत भक्ति ज्ञान महायज्ञ श्रद्धा और आस्था के वातावरण में अपने चौथे दिन पर पहुंचा। दूर-दराज़ से आए श्रद्धालु कथा श्रवण कर आत्मिक शांति और मोक्ष मार्ग का अनुभव कर रहे हैं।
चतुर्थ दिवस की कथा में श्री धाम वृंदावन से पधारे आचार्य रमाशंकर दास महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का अद्भुत वर्णन कर ग्रामवासियों को भक्तिरस से सराबोर किया।
उन्होंने कहा—
“भगवान का अवतार धर्म की स्थापना और अधर्म विनाश हेतु होता है। जो उनके शरणागत हो जाता है, उसके जीवन के मंगल को कोई विघ्न रोक नहीं सकता।”
कथा के पंचम दिवस पर गोवर्धन पूजा, गोवर्धन लीला तथा भगवान का 56 भोग अर्पित किया जाएगा।
मंगलाचरण का महत्व
आचार्य रमाशंकर दास महाराज ने व्यासपीठ से मंगलाचरण के महत्व को समझाते हुए कहा कि प्रभात, मध्यान्ह और रात्रि में सोने से पूर्व मंगलाचरण अवश्य करना चाहिए।
उन्होंने स्पष्ट किया—
ईश्वर के किसी एक स्वरूप का चिंतन करने से मन उसी स्वरूप में अवस्थित हो जाता है।
ध्यान का अर्थ है मानस-दर्शन, और निरंतर चिंतन से मनुष्य में ईश्वर के गुण विकसित होने लगते हैं।
मंगलाचरण करने से समस्त मनोविकार नष्ट होते हैं और साधक मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर होता है।
ब्रह्मांड की समस्त शक्तियां प्रसन्न होकर शुभ कार्य में सहयोग करती हैं।
एक ही सत्य, अनेक रूपों में प्रकट
आचार्य ने वेद वाक्य “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति” का उल्लेख करते हुए बताया कि ईश्वर एक ही है, बस ज्ञानी लोग उसे अलग-अलग रूपों में पुकारते हैं।
उन्होंने कहा—
“जैसे दर्पण एक ही होता है, पर उसके सामने रखी वस्तु के अनुसार प्रतिछाया बदल जाती है। ठीक उसी प्रकार सत्यरूप ईश्वर एक है, जिसे कोई राम कहता है, कोई कृष्ण, कोई शिव, कोई देवी। परंतु आराध्य एक ही परमात्मा हैं।”
सनातन धर्म की महानता
आचार्य ने कहा कि हिन्दू वैदिक धर्म को लेकर भ्रांतियां फैलाई जाती हैं कि इसमें अनेक देवताओं की पूजा होती है। जबकि वास्तव में सनातन धर्म में एक ही ईश्वर की पूजा होती है, उनके स्वरूप और नाम मात्र भिन्न हैं।
उन्होंने इसे सनातन धर्म की विशालता और समग्रता बताया और कहा कि—
“वैदिक धर्म कोई संप्रदाय नहीं, बल्कि समग्र जीवन का मार्ग है। इसमें किसी पर कोई प्रतिबंध नहीं, प्रत्येक साधक अपने आराध्य स्वरूप का चिंतन, भजन और कीर्तन कर सकता है। यही सनातन धर्म की महानता है।”
भव्य समापन 2 सितम्बर को
कार्यक्रम का समापन 2 सितम्बर 2025 को विशाल हवन व भंडारे के साथ कि
या जाएगा। इसमें सभी भक्तों को आमंत्रित किया गया है।




