एफ़आईआर दर्ज नहीं, जांच भी नहीं—गढ़ थाने की निष्क्रियता पर उठे सवाल, पीड़िता को तीन साल से न्याय का इंतज़ार
गढ़ थाना क्षेत्र से सामने आए एक गंभीर मामले ने पुलिस की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। आदिवासी महिला ममता कोल ने आरोप लगाया है कि उसके Fino Bank खाते से बिना जानकारी के हजारों रुपये निकाले गए, लेकिन कई बार आवेदन देने के बावजूद न तो एफआईआर दर्ज की गई और न ही आज तक मामले को जांच में लिया गया।
पीड़िता के अनुसार, उसका Fino बैंक खाता शासन की लाड़ली बहना योजना के तहत खुलवाया गया था। खाता खुलवाने और संचालन में गांव के एक कीओस्क संचालक की भूमिका रही। आरोप है कि इसी दौरान उसकी अनपढ़ता का फायदा उठाकर बायोमेट्रिक मशीन से अंगूठा लगवाया गया, मोबाइल नंबर बदला गया और खाते में आने वाली राशि की निकासी कर ली गई।
तीन साल में निकाले गए हजारों रुपये
बैंक स्टेटमेंट के अनुसार 22 सितंबर 2022 से 13 जुलाई 2025 के बीच कई बार धनराशि निकाली गई। पीड़िता का कहना है कि उसे केवल शुरुआती 8 किस्तें ही मिलीं, उसके बाद योजना की राशि कभी हाथ में नहीं आई। बाद में जब उसने जानकारी चाही तो उसे यह कहकर टाल दिया गया कि उसकी उम्र 60 वर्ष हो गई है, इसलिए अब योजना का पैसा नहीं आएगा।
धोखाधड़ी, जालसाजी और कूटरचना के गंभीर आरोप
पीड़िता ने अपने आवेदन में स्पष्ट रूप से धोखाधड़ी, जालसाजी, कूटरचना और आईटी एक्ट के तहत अपराध का उल्लेख किया है। उसने बैंक स्टेटमेंट, शपथ पत्र और अन्य दस्तावेज भी पुलिस को सौंपे हैं। इसके बावजूद गढ़ थाना प्रभारी द्वारा आज तक न एफआईआर दर्ज की गई और न ही प्रारंभिक जांच शुरू की गई, जिससे पीड़िता मानसिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से परेशान है।
प्रशासनिक चुप्पी पर सवाल
यह मामला केवल एक महिला की ठगी का नहीं, बल्कि सरकारी योजनाओं के दुरुपयोग और कमजोर वर्गों के शोषण का प्रतीक बनता जा रहा है। सवाल यह है कि
जब लिखित शिकायत, साक्ष्य और बैंक स्टेटमेंट मौजूद हैं,
जब स्पष्ट अवधि और राशि का उल्लेख है,
तब पुलिस किस आधार पर कार्रवाई से बच रही है?
पीड़िता की मांग
पीड़िता ने जिला प्रशासन और पुलिस अधीक्षक से मांग की है कि
1. तत्काल एफआईआर दर्ज की जाए,
2. निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कड़ी कार्रवाई हो,
3. खाते से निकाली गई पूरी राशि वापस दिलाई जाए,
4. और इस लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की भी जवाबदेही तय की जाए।
न्याय की गुहार
तीन वर्षों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी न्याय न मिलना, कानून व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है। यदि अब भी कार्रवाई नहीं होती, तो यह संदेश जाएगा कि गरीब, अनपढ़ और आदिवासी वर्ग की आवाज़ व्यवस्था में अनसुनी ही रह जाती है।
अब देखना यह है कि प्रशासन इस मामले को कितनी गंभीरता से लेता है—या फिर एक और पीड़िता न्याय की आस में दर-दर भटकने को मजबूर होगी।






