संभागीय आयुक्त व कलेक्टर के आदेशों की अनदेखी? राजस्व न्यायालयों की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल
रीवा/मऊगंज। संभागीय आयुक्त एवं जिला कलेक्टर द्वारा समय-समय पर जारी किए जा रहे निर्देशों और आदेशों के बावजूद जमीनी स्तर पर राजस्व न्यायालयों की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि तहसील स्तर की निचली अदालतें उच्चाधिकारियों के आदेशों को अपेक्षित गंभीरता से नहीं ले रहीं, जिससे आमजन विशेषकर गरीब वर्ग को न्याय मिलने में बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है।
तहसील स्तर पर अव्यवस्था के आरोप
नाम न छापने की शर्त पर कई नागरिकों ने बताया कि तहसील कार्यालयों में छोटे कर्मचारियों एवं कुछ निजी व्यक्तियों द्वारा “सेवा शुल्क” के नाम पर अवैध वसूली की शिकायतें सामने आ रही हैं। लोगों का कहना है कि ऐसे व्यवहार के कारण न केवल भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल रहा है, बल्कि राजस्व न्यायालयों में लंबित प्रकरणों की संख्या भी बढ़ती जा रही है।
विशेष रूप से तहसील देवतालाब, मनगवा, नईगढ़ी तथा मऊगंज जिले की अन्य तहसीलों में पटवारी एवं राजस्व निरीक्षकों की कार्यप्रणाली को लेकर असंतोष व्यक्त किया गया है। सीमांकन और बंटवारे के मामलों में बार-बार सीमाएं बदलने की शिकायतें सामने आई हैं, जिससे भूमि विवाद और गहराते जा रहे हैं।
सीमांकन में बदलती सरहदें, बढ़ते विवाद
ग्रामीणों का आरोप है कि जितनी बार सीमांकन होता है, उतनी बार सीमाएं परिवर्तित हो जाती हैं। इससे न केवल राजस्व अभिलेखों में भ्रम की स्थिति बनती है, बल्कि परिवारों के बीच तनाव और विवाद भी बढ़ते हैं। कई मामलों में भूमि बंटवारे को लेकर भाई-भाई के बीच दूरी तक उत्पन्न हो रही है।
लोगों का यह भी कहना है कि कंप्यूटरीकृत अभिलेखों (खसरा-खतौनी) में त्रुटियां बढ़ती जा रही हैं, जिनके सुधार में महीनों लग जाते हैं। इस बीच संबंधित पक्षों को न्यायालयों के चक्कर काटने पड़ते हैं।
गोपनीय जांच की मांग
स्थानीय नागरिकों ने संभागीय आयुक्त एवं जिला प्रशासन से मांग की है कि तहसील स्तर की कार्यप्रणाली की गोपनीय एवं खुफिया जांच कराई जाए, ताकि दोषी अधिकारियों एवं कर्मचारियों पर प्रभावी कार्रवाई हो सके। उनका सुझाव है कि यदि सीमांकन में बार-बार त्रुटि पाई जाती है और सीमाएं बदलती हैं, तो संबंधित अधिकारी के विरुद्ध तत्काल कार्रवाई का प्रावधान होना चाहिए। इससे निचले स्तर के अधिकारियों में जवाबदेही और अनुशासन सुनिश्चित हो सकेगा।
भय का माहौल, खुलकर बोलने से परहेज
कई लोगों ने आशंका जताई कि यदि वे खुलकर शिकायत करेंगे तो उनके राजस्व अभिलेखों में और अधिक विसंगतियां उत्पन्न कर दी जाएंगी। इस डर के कारण वे नाम सार्वजनिक करने से बच रहे हैं। उनका कहना है कि वर्षों तक न्यायालयों के चक्कर लगाते-लगाते पीढ़ियां गुजर जाती हैं, पर समाधान नहीं मिलता।
जनचर्चा में राजनीतिक निष्क्रियता
क्षेत्र में यह भी चर्चा है कि न तो वर्तमान सत्ताधारी दल और न ही विपक्ष इस विषय को गंभीरता से उठा पा रहे हैं। वर्ष 2004 के पूर्व जिस प्रकार विपक्ष सक्रिय भूमिका निभाता था, वैसी प्रभावी आवाज अब कम सुनाई देती है। परिणामस्वरूप राजस्व संबंधी समस्याएं जनचर्चा का विषय तो बन रही हैं, पर ठोस समाधान की दिशा में अपेक्षित पहल दिखाई नहीं दे रही।
राजस्व न्यायालयों और तहसील स्तर की प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और तकनीकी सुधार की तत्काल आवश्यकता है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो भूमि विवादों की बढ़ती संख्या सामाजिक ताने-बाने को भी प्रभावित कर सकती है। प्रशासन से अपेक्षा है कि वह आमजन के विश्वास को पुनर्स्थापित करने हेतु कठोर और निष्पक्ष कार्रवाई सुनिश्चित करे।


