भीषण गर्मी में ‘प्यासा गढ़’: करोड़ों की योजना ठप, बिजली बिल न भरने से जल सप्लाई बंद
जनप्रतिनिधियों की उदासीनता से आक्रोशित ग्रामीण, शासन-प्रशासन से त्वरित हस्तक्षेप की मांग
रीवा जिले की जनपद पंचायत गंगेव अंतर्गत ग्राम पंचायत गढ़ इन दिनों भीषण पेयजल संकट से जूझ रही है। चिलचिलाती गर्मी और 42 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान के बीच गांव की अधिकांश आबादी बूंद-बूंद पानी के लिए भटकने को मजबूर है। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि ग्रामीणों का विश्वास अब न केवल स्थानीय जनप्रतिनिधियों बल्कि पूरे सरकारी तंत्र से डगमगाने लगा है।
40 वर्षों पुरानी व्यवस्था ध्वस्त, नई योजना बनी ‘सफेद हाथी’
ग्रामीणों के अनुसार, गढ़ पंचायत में पिछले लगभग 40 वर्षों से पेयजल आपूर्ति की व्यवस्था सुचारू रूप से संचालित होती रही थी। लेकिन हाल ही में केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी ‘जल जीवन मिशन’ योजना के तहत नई पानी टंकी का निर्माण, पाइपलाइन बिछाने और अन्य व्यवस्थाओं पर लाखों-करोड़ों रुपये खर्च किए गए। विधिवत पूजा-अर्चना और उद्घाटन के बाद योजना को पंचायत के सुपुर्द कर दिया गया, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यह पूरी योजना महज एक महीने के भीतर ही दम तोड़ चुकी है।
बिजली बिल बना सबसे बड़ी बाधा, 90 प्रतिशत आबादी प्रभावित
सूत्रों के मुताबिक, जल आपूर्ति योजना का संचालन बिजली पर निर्भर है, लेकिन पंचायत द्वारा बिजली बिल का भुगतान नहीं किए जाने के कारण पिछले एक माह से मोटर बंद पड़ी है। इसका सीधा असर यह हुआ कि गांव की लगभग 90 प्रतिशत आबादी पानी से वंचित हो गई है। विडंबना यह है कि करोड़ों रुपये खर्च कर बनाई गई योजना एक मामूली प्रशासनिक लापरवाही की भेंट चढ़ गई।
बाजारू पंचायत में विकट स्थिति, हजारों लोग रोजाना प्रभावित
गढ़ केवल एक साधारण गांव नहीं, बल्कि एक प्रमुख बाजारू पंचायत है, जहां प्रतिदिन हजारों लोगों का आवागमन होता है। यहां शासकीय कार्यालय, व्यापारिक प्रतिष्ठान और आसपास के ग्रामीणों की आवाजाही के चलते पानी की मांग अत्यधिक रहती है। ऐसे में जल संकट ने न केवल स्थानीय निवासियों बल्कि बाहरी लोगों को भी भारी परेशानी में डाल दिया है। छोटे-छोटे बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग दूर-दराज से पानी लाने को विवश हैं।
कटिया के सहारे चल रही व्यवस्था, सामाजिक संगठन भी निष्क्रिय
कुछ लोग अवैध रूप से बिजली कनेक्शन (कटिया) जोड़कर पानी निकालने का प्रयास कर रहे हैं, जिससे केवल सीमित परिवारों को ही राहत मिल पा रही है। हैरानी की बात यह है कि इस विकट परिस्थिति में कोई भी सामाजिक संगठन या स्थानीय पहल सामने नहीं आई है, जिससे संकट और गहरा गया है।
जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर सवाल, शिकायतों के बाद भी नहीं समाधान
ग्रामीणों का आरोप है कि उन्होंने कई बार सरपंच, पंचायत प्रतिनिधियों और संबंधित अधिकारियों से संपर्क कर समस्या से अवगत कराया, लेकिन हर बार केवल आश्वासन ही मिला। जमीनी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई न होने से जनता में भारी आक्रोश व्याप्त है। लोगों का कहना है कि मंचों पर विकास के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन वास्तविकता में बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं।
खर्च पर उठे सवाल, ‘कमीशन’ पर तंज
स्थानीय लोगों ने यह भी सवाल उठाया कि जहां एक ओर पंचायत क्षेत्र में पेपर ब्लॉक जैसे कार्यों पर 50-50 लाख रुपये तक खर्च किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर बिजली बिल जैसी अनिवार्य जिम्मेदारी की अनदेखी क्यों की जा रही है। ग्रामीणों ने तंज कसते हुए कहा कि “शायद बिजली बिल में कमीशन की गुंजाइश नहीं थी, इसलिए इसे नजरअंदाज कर दिया गया।”
प्रशासन से गुहार: ‘साहब, इस गर्मी में पानी तो दिलवा दीजिए’
गढ़ पंचायत के लोगों ने समाचार पत्र के माध्यम से प्रदेश के उपमुख्यमंत्री, संभागीय आयुक्त और जिला कलेक्टर से भावुक अपील की है कि इस भीषण गर्मी में कम से कम पेयजल की व्यवस्था तत्काल बहाल कराई जाए। उनका कहना है कि पानी जैसी बुनियादी जरूरत के लिए भी यदि उन्हें संघर्ष करना पड़े, तो यह शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रशासन इस गंभीर समस्या को प्राथमिकता देगा, या फिर गढ़ की जनता यूं ही प्यास से जूझती रहेगी। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि जनता की आवाज सत्ता के गलियारों तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुंच पाती है।

