पत्रकारिता की साख पर बढ़ता संकट और परिवारवादी संस्थानों की चुनौती
रीवा (मध्य प्रदेश)। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाने वाली पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सत्ता और समाज के बीच पारदर्शिता स्थापित करना, जनहित के मुद्दों को प्रमुखता देना तथा लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करना है। किंतु बदलते समय के साथ पत्रकारिता के सामने कई नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। इनमें सबसे गंभीर चुनौती इसकी विश्वसनीयता, निष्पक्षता और नैतिक मूल्यों पर उठ रहे प्रश्न हैं। रीवा सहित प्रदेश के अनेक क्षेत्रों में पत्रकारिता की कार्यप्रणाली को लेकर समय-समय पर उठने वाली चर्चाएं इस बात का संकेत देती हैं कि व्यवस्था में व्यापक सुधार की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
पत्रकारिता मूलतः समाज सेवा का माध्यम रही है, लेकिन अनेक स्थानों पर यह धारणा बनती जा रही है कि कुछ संस्थानों में इसका स्वरूप व्यावसायिक हितों तक सीमित होता जा रहा है। कई मामलों में एक ही परिवार के विभिन्न सदस्य अलग-अलग पदों पर रहकर समाचार पत्रों या पत्रिकाओं का संचालन करते दिखाई देते हैं। स्वयं में पारिवारिक संचालन अनुचित नहीं कहा जा सकता, किंतु यदि इससे प्रतिस्पर्धा, पारदर्शिता या सरकारी संसाधनों के निष्पक्ष वितरण पर प्रश्न उठते हैं, तो उन पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
सरकारी विज्ञापन नीति और पारदर्शिता का प्रश्न
सरकारी विज्ञापन जनता के कर से प्राप्त धन से दिए जाते हैं। इसलिए यह स्वाभाविक अपेक्षा है कि इनका वितरण पूरी तरह निष्पक्ष, पारदर्शी और वस्तुनिष्ठ मानकों के आधार पर हो। यह सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है कि जिन समाचार पत्रों और पत्रिकाओं को सरकारी विज्ञापन दिए जा रहे हैं, उनका वास्तविक प्रकाशन, प्रसार, पाठक संख्या तथा नियमित प्रकाशन स्वतंत्र और विश्वसनीय प्रक्रिया से सत्यापित हो। यदि कहीं केवल औपचारिक या कागजी संचालन के आधार पर सरकारी लाभ प्राप्त किए जा रहे हों, तो ऐसी स्थितियों की निष्पक्ष जांच होना जनहित में आवश्यक है।
डिजिटल युग में पीडीएफ संस्करण और ऑनलाइन प्रसार का महत्व बढ़ा है, लेकिन इनके आधार पर प्रस्तुत किए जाने वाले आंकड़ों की प्रमाणिकता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। पारदर्शी सत्यापन व्यवस्था न केवल सरकारी धन के सदुपयोग को सुनिश्चित करेगी, बल्कि वास्तविक रूप से कार्यरत समाचार संस्थानों का भी संरक्षण करेगी।
वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता
किसी भी समाचार संस्थान की विश्वसनीयता केवल उसके समाचारों से नहीं, बल्कि उसके संचालन की पारदर्शिता से भी तय होती है। यदि किसी संस्था के वित्तीय स्रोत, कर्मचारियों की नियुक्ति, वेतन भुगतान तथा श्रम कानूनों के पालन को लेकर सार्वजनिक प्रश्न उठते हैं, तो सक्षम एजेंसियों द्वारा निष्पक्ष जांच लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा होनी चाहिए। ऐसी जांच का उद्देश्य किसी व्यक्ति या संस्था को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करना होना चाहिए।
पत्रकारिता की आड़ में बढ़ती अव्यवस्थाओं पर नियंत्रण जरूरी
समाज में समय-समय पर यह चिंता भी सामने आती रही है कि कुछ लोग पत्रकारिता की पहचान का दुरुपयोग कर निजी हितों की पूर्ति, प्रभाव निर्माण अथवा अनुचित लाभ लेने का प्रयास करते हैं। यदि कहीं ऐसा हो रहा है, तो यह न केवल पत्रकारिता की गरिमा को ठेस पहुंचाता है बल्कि उन हजारों ईमानदार पत्रकारों की प्रतिष्ठा को भी प्रभावित करता है, जो सीमित संसाधनों में जनहित की पत्रकारिता कर रहे हैं। ऐसे मामलों में कठोर और निष्पक्ष कार्रवाई आवश्यक है ताकि पत्रकारिता की साख बनी रहे।
धर्म और सामाजिक आस्था का सम्मान
पत्रकारिता का धर्म सत्य और निष्पक्षता है। इसी प्रकार धार्मिक प्रतीकों और संत परंपरा का भी समाज में विशेष सम्मान है। यदि कोई व्यक्ति किसी भी धार्मिक पहचान या सामाजिक प्रतीक का उपयोग अनुचित गतिविधियों के लिए करता है, तो उससे पूरे समाज की आस्था प्रभावित होती है। ऐसे मामलों में कानून के अनुसार कार्रवाई होना ही लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती का परिचायक है।
सुधार ही समाधान
आज आवश्यकता किसी व्यक्ति या संस्था विशेष को कटघरे में खड़ा करने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था विकसित करने की है जिसमें पत्रकारिता पूरी पारदर्शिता, जवाबदेही और नैतिक मूल्यों के साथ आगे बढ़े। सरकारी विज्ञापन वितरण प्रणाली की समय-समय पर स्वतंत्र समीक्षा, समाचार पत्रों के प्रसार का निष्पक्ष सत्यापन, वित्तीय पारदर्शिता, श्रम कानूनों का पालन तथा पत्रकारिता से जुड़े आचार संहिता का प्रभावी अनुपालन इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब पत्रकारिता स्वतंत्र होने के साथ-साथ उत्तरदायी भी रहे। जनता का विश्वास ही मीडिया की सबसे बड़ी पूंजी है। यदि इस विश्वास को बनाए रखना है तो पत्रकारिता को स्वयं आत्ममंथन करना होगा और शासन-प्रशासन को भी पारदर्शी व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी। निष्पक्ष, निर्भीक और जनोन्मुख पत्रकारिता ही लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है, और उसकी गरिमा की रक्षा करना समाज, सरकार तथा मीडिया—सभी की साझा जिम्मेदारी है।

