रीवा, में इन दिनों पत्रकारिता की छवि लगातार धूमिल होती जा रही है। सोशल मीडिया और यूट्यूब चैनलों पर पत्रकारों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि ने पत्रकारिता के वास्तविक स्वरूप को आघात पहुंचाया है। जिला मुख्यालय से लेकर गांव-गांव तक, माइक लेकर लोग खुद को पत्रकार बताकर निर्माण कार्यों और शासकीय कार्यालयों का निरीक्षण करते घूम रहे हैं। कई बार ये इस तरह व्यवहार करते हैं मानो जांच एजेंसी हों।
रीवा में पत्रकारिता की आड़ में वसूली का खेल, साख पर खतरा
हाल ही में एक घटना ने स्थिति को और चिंताजनक बना दिया है। चोरहटा थाना क्षेत्र के अंतर्गत नेशनल हाईवे पर बकरी परिवहन कर रहे एक ट्रक को कथित पत्रकारों ने रोककर जांच करनी शुरू कर दी। आरोप है कि उन्होंने ट्रक चालक को डराया-धमकाया और 50,000 रुपये की मांग की। ट्रक चालक ने विवश होकर 30,000 रुपये देने की बात कही, परंतु साहस जुटाकर पुलिस स्टेशन जाकर शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने तत्काल मामले की जांच शुरू कर दी है और इस घटना में संलिप्त छह पत्रकारों की पहचान कर ली गई है।
इस तरह की घटनाएं समाज में पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रही हैं। पत्रकारिता को समाज का चौथा स्तंभ माना जाता है, किंतु कुछ व्यक्तियों द्वारा इसके नाम पर की जा रही वसूली से इस प्रतिष्ठित पेशे पर कलंक लग रहा है। जिले में अस्पताल, स्कूल, आंगनवाड़ी केंद्र, पंचायत भवन और विभिन्न सरकारी कार्यालयों में दबाव बनाने वाले इन तथाकथित पत्रकारों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। पहले भी कुछ संदिग्ध लोग इस पेशे में शामिल हुए थे, जो अब अपनी शानो-शौकत से संदेह के घेरे में हैं।
संभागीय आयुक्त को चाहिए कि इस स्थिति पर गंभीरता से विचार करें और पत्रकारों की पहचान व उनके कार्यों को स्पष्ट करने के लिए एक विशेष टीम का गठन करें। पत्रकारिता का उद्देश्य जनता की आवाज को सशक्त बनाना है, न कि इसे वसूली का माध्यम बनाना। जिले के वरिष्ठ पत्रकारों और प्रशासनिक अधिकारियों को मिलकर इस प्रकार के कृत्यों को रोकने के लिए सख्त कदम उठाने की जरूरत है, ताकि समाज में पत्रकारिता की गरिमा बनी रहे।

