प्राइवेट स्कूलों में राजनीतिक हस्तक्षेप और कर्मचारियों का शोषण: गढ़ सरस्वती शिशु मंदिर का मामला
रीवा, मध्य प्रदेश:
भारत में शिक्षा को समाज और संस्कृति के उत्थान का माध्यम माना जाता है, और सरस्वती शिशु मंदिर जैसी संस्थाएं इस दिशा में अग्रणी भूमिका निभाती रही हैं। लेकिन, रीवा जिले के गढ़ सरस्वती शिशु मंदिर उच्चतर माध्यमिक विद्यालय का वर्तमान परिदृश्य शिक्षा और संस्कार के आदर्शों के विपरीत दिख रहा है। विद्यालय में व्याप्त अनियमितताओं, राजनीतिक हस्तक्षेप, और कर्मचारियों के शोषण ने इसे विवादों के केंद्र में ला दिया है।
समिति प्रबंधन में राजनीतिक दखल
विद्यालय का संचालन स्थानीय स्तर पर समिति द्वारा किया जाता है, जिसमें प्रबंध समिति और साधारण समिति शामिल होती है। इन समितियों का गठन सरस्वती शिक्षा परिषद के नियमानुसार किया जाना चाहिए, लेकिन आरोप हैं कि जिला सचिव नीरज खरे द्वारा मनमानी और दबावपूर्ण हस्तक्षेप किया जा रहा है।
प्रबंध समिति के सदस्यों को बिना किसी ठोस कारण के हटाया जा रहा है।
उनके स्थान पर ऐसे सदस्यों को नियुक्त किया गया है, जिन पर सरकारी भूमि पर अतिक्रमण और निजी स्वार्थ के लिए विद्यालय के संसाधनों के दुरुपयोग के गंभीर आरोप हैं।
समिति की बैठकों में पारदर्शिता का अभाव है और निर्णय पक्षपातपूर्ण ढंग से लिए जा रहे हैं।
कर्मचारियों के साथ आर्थिक अन्याय
विद्यालय के कर्मचारियों का कहना है कि उन्हें पिछले पांच महीनों से वेतन नहीं दिया गया है। वेतन में महंगाई भत्ते को लेकर भी भारी असमानता है:
प्राचार्य को 50% महंगाई भत्ता दिया जा रहा है, जबकि अन्य शिक्षकों और कर्मचारियों को मात्र 25% से 30% तक दिया गया है।
कुछ कर्मचारियों को पिछले तीन वर्षों के दौरान नियमित वेतन नहीं मिला, जिससे उनका आर्थिक संकट गहराता जा रहा है।
कर्मचारियों ने आरोप लगाया है कि विद्यालय प्रबंधन उनके विरोध पर ध्यान नहीं देता, और उनका उत्पीड़न बढ़ता जा रहा है।
छात्र संख्या में गिरावट और शिक्षकों की कमी
विद्यालय में छात्रों की संख्या में लगातार गिरावट हो रही है, जो प्रबंधन की अक्षमता का परिणाम है।
जिन विषयों के शिक्षकों की आवश्यकता है, उनकी नियुक्ति नहीं की जा रही है।
आवश्यकता न होने के बावजूद, बाहरी दबाव के चलते कुछ शिक्षकों को विद्यालय में लाया गया है।
निर्माण कार्यों और खर्चों में गड़बड़ियां
विद्यालय में छोटे-मोटे निर्माण कार्य लगातार चल रहे हैं, लेकिन इन कार्यों में पारदर्शिता का अभाव है।
छात्रों के शुल्क का उपयोग इन कार्यों में किया जा रहा है, लेकिन गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं।
परिषद या अन्य सदस्यों के आगमन पर खर्चों को भी अनावश्यक रूप से बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा है।
अन्य प्रमुख समस्याएं
1. सेवानिवृत्ति से संबंधित अनियमितताएं:
कुछ शिक्षकों को सेवानिवृत्ति से पहले ही सेवा से हटा दिया गया।
कुछ का कार्यकाल जबरदस्ती बढ़ाया गया, जिससे अन्य कर्मचारियों में असंतोष है।
2. कर्मचारियों की छुट्टी और मेडिकल अवकाश का मामला:
कुछ कर्मचारियों को अवकाश लेने में कोई समस्या नहीं होती, जबकि अन्य को चिकित्सा अवकाश के लिए भी अनुमति नहीं दी जाती।
3. शिक्षा और संस्कार पर पड़ता असर:
विद्यालय में छात्रों की घटती संख्या और अनियमितता से शिक्षा की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।
संस्कार और संस्कृति पर ध्यान देने के बजाय विद्यालय प्रशासन व्यक्तिगत हितों की पूर्ति में लगा है।
प्राचार्य का पक्ष
इस संबंध में जब वर्तमान प्राचार्य अरविंद पांडे से बात की गई, तो उन्होंने सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि वेतन और अन्य लाभ समय पर दिए जा रहे हैं। हालांकि, कर्मचारियों का कहना है कि वेतन वितरण में पारदर्शिता नहीं है, और प्राचार्य का दावा तथ्यात्मक रूप से गलत है।
जांच की मांग और समाधान का आग्रह
इस मामले में कर्मचारियों और पूर्व पदाधिकारियों ने सरस्वती शिक्षा परिषद से निष्पक्ष जांच की मांग की है।
दोषी जिला सचिव और प्रबंधन समिति के सदस्यों पर कार्रवाई होनी चाहिए।
कर्मचारियों को समय पर वेतन और अन्य लाभ उपलब्ध कराए जाने चाहिए।
शिक्षा और संस्कार को प्राथमिकता देते हुए छात्रों के हितों को सुरक्षित किया जाना चाहिए।
समाज और प्रशासन की जिम्मेदारी
सरस्वती शिशु मंदिर जैसी संस्थाएं समाज में शिक्षा और संस्कृति की अलख जगाने के लिए जानी जाती हैं। इस प्रकार के विवाद न केवल संस्था की साख को नुकसान पहुंचाते हैं, बल्कि शिक्षा के पवित्र उद्देश्य को भी प्रभावित करते हैं। आवश्यकता है कि सरकार, परिषद, और स्थानीय प्रशासन इस मामले को गंभीरता से लेकर आवश्यक कदम उठाएं।

