मध्य प्रदेश में धान खरीदी घोटाला: रीवा जिले में 5100 कुंटल बोगस धान का खुलासा, जांच के आदेश
रीवा, मध्य प्रदेश। राज्य में किसानों से समर्थन मूल्य पर धान खरीदी के दौरान बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार उजागर हुआ है। रीवा जिले के एक धान खरीदी केंद्र में 5100 कुंटल बोगस धान दर्ज किए जाने का मामला सामने आया है, जिससे सरकारी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। धान खरीदी प्रक्रिया में अनियमितताएँ, अधिकारियों और नेताओं की मिलीभगत तथा बिचौलियों द्वारा नियमों की धज्जियाँ उड़ाने के आरोप लग रहे हैं।
घोटाले का अच्छी धान आगे, खराब धान अंदर
सूत्रों के अनुसार, खरीदी केंद्रों पर पहले से सुनियोजित तरीके से भ्रष्टाचार को अंजाम दिया जा रहा है। गोदामों में गुणवत्ता विहीन धान को छिपाने के लिए अच्छी धान को आगे और खराब धान को अंदर रखा गया है, जिससे जांच टीम के लिए सटीक जांच करना मुश्किल हो गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस तरह की धान उपभोक्ताओं तक पहुँची तो गरीबों को वितरित होने वाले चावल की गुणवत्ता प्रभावित होगी और इससे स्वास्थ्य संबंधी खतरे भी बढ़ सकते हैं।
गड़बड़ियों की परतें: किसान कोड नहीं, अनियमित भंडारण
खरीदी प्रक्रिया के दौरान सरकारी नियमों की खुली अवहेलना की गई है। धान की बोरियों पर किसान कोड अंकित नहीं किए गए, जो खरीदी प्रक्रिया की पारदर्शिता के लिए बेहद आवश्यक था। किसान कोड न होने के कारण यह पता लगाना असंभव हो गया है कि धान किसने बेची और उसकी वास्तविक गुणवत्ता क्या थी। इस लापरवाही से यह संदेह और गहरा हो गया है कि धान की खरीद में बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा किया गया है।
इसके अलावा, वेयरहाउस में भंडारण के दौरान मानकों की अनदेखी की गई है। जांच में पाया गया कि धान के थोक स्टॉक में अधिक नमी की समस्या है, जिससे उठाव के बाद चावल खराब होने की आशंका है।
सरकारी आदेश, लेकिन क्या होगा असर?
मध्य प्रदेश सरकार के खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग द्वारा पत्र क्रमांक 379/पब्लिक उपार्जन/2025 दिनांक 24 जनवरी 2025 को जारी किया गया, जिसमें रीवा समेत कई जिलों में व्यापक जांच के आदेश दिए गए हैं। इस आदेश के तहत राजस्व, सहकारिता, कृषि, खाद्य और अन्य विभागों की टीमों को गठित कर विस्तृत जांच की जानी है।
हालांकि, जानकारों का मानना है कि जांच में देरी होने से घोटाले से जुड़े महत्वपूर्ण साक्ष्य नष्ट होने का खतरा बढ़ सकता है। यदि जांच प्रक्रिया को शीघ्र और पारदर्शी तरीके से पूरा नहीं किया गया तो दोषियों को बच निकलने का अवसर मिल सकता है।
सेवा शुल्क के नाम पर खुली लूट
धान खरीदी प्रक्रिया में सेवा शुल्क के नाम पर बड़े पैमाने पर गड़बड़ियों और अवैध लेन-देन का खुलासा हुआ है। प्रत्येक कुंतल धान पर 15 से 20 रुपए तक की सेवा शुल्क वसूली जा रही है, जिसमें विभिन्न विभागों के अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत उजागर हुई है। खरीदी केंद्रों से लेकर वेयरहाउस तक प्रत्येक स्तर पर घूसखोरी और भ्रष्टाचार के साक्ष्य सामने आ रहे हैं।
नेताओं और अधिकारियों की सांठगांठ
रीवा और मऊगंज जिले के कई खरीदी केंद्रों के प्रभारियों का स्थानीय नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों से नजदीकी संबंध होने के कारण यह घोटाला लंबे समय से चल रहा है। यह भी सामने आया है कि वर्षों से एक ही स्थान पर जमे हुए अधिकारी और कर्मचारियों को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है, जिससे कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पाती।
क्या गरीबों को मिलेगा गुणवत्तापूर्ण चावल?
भारत सरकार द्वारा गरीबों को निशुल्क चावल उपलब्ध कराने की योजना में इस घोटाले का सीधा असर पड़ सकता है। भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के चलते यदि गुणवत्ता विहीन धान से चावल तैयार किया गया तो गरीबों को मिलने वाला चावल पोषण स्तर पर खरा नहीं उतरेगा, जिससे उनकी सेहत को खतरा हो सकता है।
समाधान के लिए क्या कदम उठाने की जरूरत है?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस घोटाले की निष्पक्ष जांच और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सरकार को निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए:
1. डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम: खरीदी और भंडारण की संपूर्ण प्रक्रिया को डिजिटल किया जाए ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
2. बायोमेट्रिक सत्यापन: किसानों की पहचान सत्यापित करने के लिए बायोमेट्रिक प्रक्रिया को अनिवार्य किया जाए।
3. स्वतंत्र जांच एजेंसी: भारत सरकार की देखरेख में निष्पक्ष और उच्च-स्तरीय स्वतंत्र जांच समिति बनाई जाए।
4. कड़ी सजा: दोषी अधिकारियों, नेताओं और बिचौलियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए।
5. जनता की भागीदारी: खरीदी प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए किसानों और उपभोक्ताओं को जागरूक किया जाए।
धान खरीदी घोटाले की यह घटना न केवल किसानों के हक को मार रही है बल्कि सरकार की खाद्य सुरक्षा योजनाओं को भी प्रभावित कर रही है। यदि भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगाई गई तो यह समस्या आने वाले वर्षों में और विकराल हो सकती है। सरकार को चाहिए कि वह निर्भीक और निष्पक्ष जांच के साथ दोषियों को सजा दिलाने के लिए ठोस कदम उठाए ताकि किसानों और आम उपभोक्ताओं का विश्वास बना रहे।

