रीवा-मऊगंज में करोड़ों का धान घोटाला: जांच के आदेश जारी, बड़े अधिकारियों तक पहुंच सकती है गाज
रीवा | 29 जनवरी 2025
मध्यप्रदेश के रीवा और मऊगंज जिलों में इस वर्ष धान खरीदी में भारी अनियमितताएं सामने आई हैं। करोड़ों रुपये की निम्न गुणवत्ता वाली धान की खरीदी और भंडारण में बड़े पैमाने पर घोटाला हुआ है। इस मामले में प्रशासनिक लापरवाही और संबंधित विभागों की मिलीभगत की आशंका जताई जा रही है।
जांच के आदेश जारी
इस घोटाले की गंभीरता को देखते हुए म.प्र. स्टेट सिविल सप्लाईज कार्पोरेशन लिमिटेड, रीवा द्वारा पत्र क्रमांक/उपार्जन/2024-25/1620-A, दिनांक 28/01/2025 को विस्तृत जांच के आदेश जारी किए गए हैं। इस पत्र के अनुसार, गोदामों में रखी धान की गुणवत्ता, किसान पंजीयन प्रक्रिया और खरीदी से संबंधित सभी वित्तीय लेन-देन की जांच की जाएगी।
कैसे हुआ घोटाला?
सूत्रों के अनुसार, उत्तर प्रदेश से सीमावर्ती जिलों में बड़ी मात्रा में निम्न गुणवत्ता वाली धान लाई गई, जिसे समर्थन मूल्य पर खरीदी गई धान के रूप में दर्ज कर दिया गया। स्थानीय किसानों के नाम पर पंजीयन कर इस धान को सरकारी उपार्जन केंद्रों पर बेचा गया, जिससे सरकार को करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ।
मुख्य गड़बड़ियां:
1. बिचौलियों की सक्रियता: कई फर्जी किसानों के नाम पर धान खरीदी गई, जबकि वास्तविक किसानों को उनका हक नहीं मिला।
2. गोदामों में गड़बड़ी: कई गोदामों में रखी गई धान की बोरियों पर किसान कोड अंकित नहीं है, और कुछ बोरियों में टैग भी गायब हैं।
3. समिति प्रबंधकों की भूमिका संदिग्ध: सहकारी समितियों के कई प्रबंधकों पर संदेह है कि उन्होंने इस गड़बड़ी को अंजाम दिया।
4. सेवा शुल्क का अवैध लेन-देन: खबरें आ रही हैं कि प्रति क्विंटल ₹1 से ₹20 तक का अवैध शुल्क लिया गया।
समाचार पत्रों ने पहले ही चेताया था
इस मामले में प्रशासन पहले से ही सतर्क किया गया था। कई स्थानीय समाचार पत्रों ने आगाह किया था कि सीमावर्ती जिलों में निम्न गुणवत्ता वाली धान की जमाखोरी हो रही है, जिसे सरकारी खरीद केंद्रों पर खपाया जा सकता है। बावजूद इसके, कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए, जिससे इतना बड़ा घोटाला हो गया।
जांच एजेंसियां होंगी सक्रिय
जांच आदेश के अनुसार, निम्नलिखित विभागों को मामले की जांच में शामिल किया गया है:
कृषि विभाग – खरीदी गई धान की गुणवत्ता की जांच करेगा।
खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग – गोदामों में रखे धान का स्टॉक सत्यापन करेगा।
सहकारिता विभाग – सहकारी समितियों की भूमिका की जांच करेगा।
राजस्व विभाग – किसानों के पंजीयन और बिक्री प्रक्रिया की समीक्षा करेगा।
प्रशासन की भूमिका पर सवाल
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब इतने विभाग और अधिकारी इस प्रक्रिया की निगरानी कर रहे थे, तो फिर यह घोटाला कैसे हुआ? क्या यह सिर्फ लापरवाही थी या जानबूझकर इसे बढ़ावा दिया गया?
जो भ्रष्टाचार उजागर हो रहा है वह केवल समिति प्रबंधक और ऑपरेटर को दोषी माना जा रहा है। किंतु सर्वेयर और अन्य विभिन्न जांच एजेंसियां जो गुणवत्ता की जांच कर रही थी उनके द्वारा क्या जांच की गई। उनके द्वारा जांच में क्या देखा गया सभी को बराबर दोषी मानते हुए उचित कानूनी कार्यवाही की जाए। और उन किसानों को भी चिन्हित किया जाए
क्या होनी चाहिए कार्रवाई?
दोषी अधिकारियों, समिति प्रबंधकों और बिचौलियों पर सख्त कार्रवाई हो।
गोदामों में रखी धान का स्वतंत्र एजेंसियों द्वारा परीक्षण कराया जाए।
घोटाले की रकम की रिकवरी कर दोषियों को दंडित किया जाए।
भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए निगरानी प्रणाली को मजबूत किया जाए।

