भाजपा में चरितार्थ होती कहावत: "बोया पेड़ बबूल का, आम कहां से होए"
भारतीय राजनीति में सत्ता और सिद्धांतों के बीच संतुलन बनाए रखना हमेशा एक बड़ी चुनौती रही है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), जो अपने अनुशासन, राष्ट्रवाद, और विचारधारा के लिए जानी जाती थी, आज ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ उसकी मूल पहचान धुंधली पड़ती दिखाई दे रही है। पार्टी में हाल ही में हुए घटनाक्रमों ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या भाजपा अपनी विचारधारा पर कायम है या केवल सत्ता प्राप्ति के लिए कोई भी समझौता करने को तैयार है। इसी संदर्भ में पुरानी कहावत "बोया पेड़ बबूल का, आम कहां से होए" पूरी तरह से भाजपा पर लागू होती दिख रही है।
पुराने समर्पित कार्यकर्ताओं की अनदेखी
भाजपा की ताकत हमेशा इसके जमीनी स्तर के कार्यकर्ता रहे हैं, जिन्होंने पार्टी की विचारधारा को जन-जन तक पहुंचाने का काम किया। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में यह देखने को मिल रहा है कि इन पुराने, निष्ठावान कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर अन्य राजनीतिक दलों से आए नेताओं को प्रमुखता दी जा रही है। ये वे नेता हैं, जो कभी भाजपा की विचारधारा के घोर विरोधी रहे हैं, लेकिन सत्ता का स्वाद चखने के लिए अब भाजपा में शामिल हो गए हैं।
पार्टी का यह रवैया पुराने कार्यकर्ताओं के मनोबल को गिराने वाला है। वर्षों से पार्टी के लिए दिन-रात मेहनत करने वाले कार्यकर्ता आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। जब समर्पित कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज कर बाहरी नेताओं को टिकट और प्रमुख पद दिए जाते हैं, तो पार्टी के मूल कार्यकर्ता अपनी निष्ठा और मेहनत पर सवाल उठाने लगते हैं।
भाजपा में दूसरी पार्टियों की राजनीतिक संस्कृति का प्रभाव
भाजपा ने जिन नेताओं को अन्य दलों से आयात किया है, वे अपनी पूर्व राजनीतिक संस्कृति और कार्यशैली को साथ लेकर आए हैं। इससे भाजपा में कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टियों जैसी कार्यशैली का समावेश हो गया है। कभी कांग्रेस पर परिवारवाद, गुटबाजी और स्वार्थ की राजनीति करने का आरोप लगता था, आज वही हालात भाजपा में बनते नजर आ रहे हैं।
रीवा जिला और मऊगंज जैसे क्षेत्रों में यह प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। यहां भाजपा के मंचों पर वे नेता प्रमुखता से नजर आ रहे हैं, जो कल तक पार्टी की आलोचना किया करते थे। अब वही नेता भाजपा की ओर से जनता के सामने आ रहे हैं, जिससे पार्टी की विचारधारा पर सवाल उठ रहे हैं।
नेताओं की चुप्पी और धृतराष्ट्र जैसी भूमिका
भाजपा के वरिष्ठ नेता और विचारक, जो कभी पार्टी के सिद्धांतों के प्रहरी हुआ करते थे, आज चुपचाप धृतराष्ट्र की भूमिका निभा रहे हैं। वे सबकुछ देख रहे हैं लेकिन कुछ बोल नहीं रहे। यह चुप्पी कहीं न कहीं पार्टी के भीतर असंतोष को जन्म दे रही है। पार्टी का नेतृत्व अगर समय रहते नहीं चेता, तो यह असंतोष भविष्य में गंभीर संकट का रूप ले सकता है।
सत्ता की राजनीति में सिद्धांतों की बलि
भाजपा ने जब विभिन्न दलों के नेताओं का खुले दिल से स्वागत किया और उन्हें सम्मानित स्थान और टिकट प्रदान किए, उसी समय यह स्पष्ट हो गया था कि पार्टी अब सत्ता प्राप्ति के लिए किसी भी प्रकार का समझौता करने को तैयार है। सिद्धांत और विचारधारा अब पीछे छूटते जा रहे हैं।
किसी भी राजनीतिक दल का सबसे बड़ा आधार उसकी विचारधारा होती है। यदि विचारधारा से समझौता किया जाए तो पार्टी की पहचान ही संकट में पड़ जाती है। भाजपा ने हमेशा "पार्टी विद ए डिफरेंस" का दावा किया, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में वह भी अन्य दलों की तरह सत्ता की राजनीति में उलझती नजर आ रही है।
रीवा संभाग में भाजपा की गिरती पकड़
रीवा संभाग में भाजपा की गिरती पकड़ इसी रणनीति का परिणाम है। यहां के पुराने भाजपा नेता और कार्यकर्ता अब खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं। जिन नेताओं को भाजपा ने सिर आंखों पर बैठाया है, वे न तो पार्टी की विचारधारा से जुड़े हैं और न ही जनता के बीच उनकी कोई मजबूत पकड़ है। इससे पार्टी का जनाधार प्रभावित हो रहा है।
भाजपा को आत्ममंथन की आवश्यकता
भाजपा को यह समझना होगा कि सत्ता की राजनीति में सफलता केवल सत्ता परिवर्तन से नहीं आती, बल्कि सिद्धांतों और विचारधारा पर अडिग रहने से मिलती है। यदि पार्टी ने समय रहते इस दिशा में आत्ममंथन नहीं किया, तो यह स्थिति पार्टी के लिए घातक हो सकती है।
पार्टी नेतृत्व को चाहिए कि वह पुराने समर्पित कार्यकर्ताओं को उचित सम्मान दे और बाहरी नेताओं की अंधाधुंध एंट्री पर नियंत्रण लगाए। साथ ही, पार्टी को अपनी मूल विचारधारा और सिद्धांतों पर मजबूती से टिके रहना चाहिए।
आज भाजपा का जो स्वरूप बनता जा रहा है, वह उसके मूल सिद्धांतों से बिल्कुल अलग है। सत्ता की भूख में पार्टी ने अपने विचारों और कार्यकर्ताओं से समझौता कर लिया है। यह स्थिति पार्टी के भविष्य के लिए खतरे की घंटी है।
धन्य है भाजपा का वर्तमान स्वरूप, धन्य हैं इसके सिद्धांत, और धन्य है इसका चरित्र, जिसने अन्य दलों की संस्कृति को अपनाकर अपने मूल सिद्धांतों से समझौता कर लिया है। पार्टी को अब यह सोचने की जरूरत है कि वह किस दिशा में जा रही है और इसका भविष्य क्या होगा।
भाजपा को अपनी विचारधारा की पुनर्स्थापना कर अपने समर्पित कार्यकर्ताओं के सम्मान और भरोसे को वापस पाना होगा, तभी पार्टी वास्तव में "पार्टी विद ए डिफरेंस" बनी रह सकेगी।

