पावन यज्ञस्थली कैथा में श्री शिवमहापुराण महायज्ञ का तीसरा दिवस भक्तिमय वातावरण में संपन्न
रुद्र संहिता के सृष्टि खंड की कथा, शिवलिंग पूजन का रहस्य, ब्रह्मा-विष्णु के अद्भुत प्रसंगों का वर्णन
(विंध्य वसुंधरा समाचार रीवा शैलेन्द्र मिश्रा)
गढ़ कैथा, रीवा (म.प्र.), 18 फरवरी 2025 – श्री हनुमान मंदिर प्रांगण, कैथा में चल रहे श्री शिवमहापुराण भक्ति ज्ञान महायज्ञ के तीसरे दिवस की कथा श्रद्धालु भक्तों के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण रही। आचार्य श्री चंद्रमणि प्रसाद पयासी जी ने अपनी ओजस्वी वाणी से भक्तों को शिवमहिमा का दिव्य अमृतपान कराया। आज के दिन रुद्र संहिता के सृष्टि खंड के गूढ़ रहस्यों पर प्रकाश डालते हुए भगवान शिव की पूजा के स्वरूप, लिंग पूजन की महत्ता, ब्रह्मा-विष्णु के अद्भुत प्रसंग, नारद जी के मोहग्रस्त होने और रुद्रगण सृष्टि की उत्पत्ति जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की गई।
ईश्वर के साकार स्वरूप की पूजा – शिवलिंग स्थापना का महत्व
भगवान शिव को साकार रूप में पूजने की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। कथा में बताया गया कि शिवलिंग केवल पत्थर या धातु का पिंड मात्र नहीं, बल्कि भगवान शिव के अनंत और निराकार ब्रह्म स्वरूप का प्रतीक है। श्रष्टि के आरंभ में जब सब कुछ निराकार था, तब उसी निराकार तत्व को लिंग के रूप में पूजने की परंपरा स्थापित हुई।
आचार्य श्री ने शिवलिंग की उत्पत्ति और पूजन से जुड़े प्रसंगों पर विस्तार से प्रकाश डाला—
भगवान शिव के आदेश से विश्वकर्मा द्वारा शिवलिंग का निर्माण किया गया।
कुबेर को स्वर्ण लिंग, मानवों को पार्थिव लिंग तथा अन्य देवताओं को विभिन्न धातुओं के लिंग प्राप्त हुए।
लिंग पूजन का तात्पर्य है, परमेश्वर के निराकार स्वरूप की आराधना करना, जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त हैं।
शिवलिंग पूजा से साधक को आत्मबोध और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
रुद्र संहिता कथा – नारद मोह, ब्रह्मा-विष्णु का संघर्ष और शिव का न्याय
आज की कथा में रुद्र संहिता के महत्वपूर्ण प्रसंगों का वर्णन किया गया, जिनमें—
1. नारद जी का मोहग्रस्त होना – एक बार नारद जी अहंकार में आकर यह सोचने लगे कि वे काम से परे हैं। तब भगवान विष्णु ने उनकी परीक्षा ली और उन्हें मोह के बंधन में डाल दिया, जिससे वे प्रेम में पड़कर विवाह करना चाहते थे।
2. भगवान विष्णु को श्राप – नारद जी जब अपने मोह से मुक्त हुए, तो क्रोधित होकर विष्णु जी को श्राप दे दिया कि उन्हें भी संसार में जन्म लेकर स्त्री के वियोग का दुख सहना पड़ेगा।
3. ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता का विवाद – दोनों देवताओं ने स्वयं को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास किया, तब भगवान शिव ने अग्नि स्तंभ (ज्योतिर्लिंग) प्रकट किया।
4. ब्रह्मा जी का असत्य बोलना – जब ब्रह्मा जी ने केतकी पुष्प को झूठी गवाही देने के लिए प्रेरित किया, तब भगवान शिव ने उन्हें श्राप दिया कि उनकी पूजा संसार में नहीं होगी।
5. भगवान विष्णु का वाराह रूप धारण करना – जब ब्रह्मा और विष्णु इस बात को नहीं समझ सके कि ज्योतिर्लिंग का आदि और अंत कहाँ है, तो विष्णु जी ने वाराह रूप धारण कर नीचे जाने का प्रयास किया, लेकिन वे भी अंत नहीं पा सके।
6. रुद्रगण सृष्टि की उत्पत्ति – भगवान शिव के आदेश से रुद्रगणों की उत्पत्ति हुई, जो संसार में शिव भक्ति और धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए कार्यरत हैं।
7. शिव और सती विवाह – दक्ष प्रजापति की पुत्री सती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की, और अंततः शिव और सती का विवाह संपन्न हुआ।
शिव ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश के मूल है।
कथा में बताया गया कि भगवान ब्रह्मा सृष्टि के रचयिता, विष्णु पालनकर्ता और महेश संहारक हैं, लेकिन ये तीनों ही सदाशिव के विभिन्न स्वरूप हैं। शिव ही सृजन, पालन और संहार के अधिपति हैं और उन्हीं के द्वारा इस संसार का संचालन होता है।
महाशिवरात्रि पर विशेष आयोजन, भक्तों की बढ़ रही श्रद्धा
कैथा की पावन भूमि पर 16 फरवरी से प्रारंभ यह दिव्य महायज्ञ 26 फरवरी तक अनवरत जारी रहेगा। इस आयोजन का समापन महाशिवरात्रि के दिन (26 फरवरी) पूर्णाहुति, भव्य महाआरती और भंडारे के साथ किया जाएगा।
श्रद्धालुओं की असीम श्रद्धा और भक्ति भाव को देखते हुए कथास्थल पर विशाल आयोजन की व्यवस्थाएँ की गई हैं। भक्तों की बढ़ती संख्या के कारण समिति द्वारा विशेष पंडाल, प्रसाद वितरण और भजन संध्या की विशेष व्यवस्था की जा रही है।
भक्तों से आग्रह – आइए, शिव कथा का श्रवण कर पुण्य लाभ प्राप्त करें
आयोजकों ने समस्त भक्तगणों से आग्रह किया है कि वे अधिक से अधिक संख्या में इस पावन आयोजन में सम्मिलित होकर शिवमहापुराण की



