कैथा में शिवमहापुराण महायज्ञ का पांचवां दिन
कुमारखंड एवं युद्धखंड की दिव्य कथा, तारकासुर एवं त्रिपुरासुर का वध, असुर जालंधर का प्रसंग
(पावन यज्ञस्थली, कैथा, रीवा (म.प्र.), 20 फरवरी 2025)
मध्यप्रदेश के कैथा स्थित हनुमान जी स्वामी मंदिर प्रांगण में चल रहा श्री शिवमहापुराण महायज्ञ श्रद्धालुजनों के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बना हुआ है। 16 फरवरी 2025 से आरंभ इस महायज्ञ में भक्तों का अपार सैलाब उमड़ रहा है। पांचवें दिवस की कथा में कुमारखंड एवं युद्धखंड का विशेष वर्णन किया गया, जिसे सुनने के लिए सैकड़ों श्रद्धालुजनों की उपस्थिति रही।
कथा का वाचन कर रहे आचार्य श्री गौरीशंकर शुक्ला जी ने भगवान शिव की महिमा का विस्तारपूर्वक वर्णन किया। उन्होंने बताया कि भगवान शिव का हर एक कार्य केवल सृष्टि के कल्याण हेतु होता है। शिव की शक्ति ही संसार को संचालित करती है। कथा में तारकासुर, त्रिपुरासुर एवं जालंधर जैसे असुरों के वध एवं उनके पापों का अंत कैसे हुआ, इसका विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया गया।
कुमारखंड एवं युद्धखंड: शिव महिमा की गौरवगाथा
शिव-पार्वती विवाह एवं कार्तिकेय जन्म
आचार्य श्री ने बताया कि जब तारकासुर का आतंक पूरे ब्रह्मांड में फैल गया, तब देवगण भगवान शिव की शरण में पहुँचे। तब नारद मुनि के सुझाव पर शिव-पार्वती विवाह का आयोजन हुआ। इस विवाह के पश्चात माता पार्वती के गर्भ से भगवान कार्तिकेय का जन्म हुआ, जिनका उद्देश्य था तारकासुर का वध।
तारकासुर वध: भगवान कार्तिकेय का पराक्रम
भगवान कार्तिकेय को युद्ध की शिक्षा देकर जब देवताओं ने उन्हें युद्धभूमि में भेजा, तो उन्होंने अपने तीव्र बाणों से तारकासुर के साम्राज्य को ध्वस्त कर दिया। अंततः घोर युद्ध के पश्चात कार्तिकेय ने तारकासुर का वध किया, जिससे समस्त देवताओं में हर्ष व्याप्त हो गया।
त्रिपुरासुर वध: शिवजी का त्रिपुरारी स्वरूप
तारकासुर के बाद, त्रिपुरासुर नामक तीन महाबली असुरों ने तीन अदृश्य नगरी बना ली थी, जिन्हें कोई भी देवता भेद नहीं सकता था। इन तीनों असुरों के अत्याचारों से देवता भयभीत होकर शिवजी की शरण में आए।
भगवान शिव ने एक विशाल धनुष का निर्माण किया और उस पर अग्निबाण चढ़ाकर तीनों असुरों के नगरों को भस्म कर दिया। इसीलिए भगवान शिव को त्रिपुरारी कहा जाता है।
असुर जालंधर का उत्थान और पराजय
कथा के अगले चरण में असुर जालंधर का वर्णन हुआ। आचार्य श्री ने बताया कि जब भगवान शिव ने अपनी नेत्राग्नि को स्थिर किया, तब उसी से जालंधर नामक महाबली असुर की उत्पत्ति हुई।
जालंधर ने अपनी शक्ति से तीनों लोकों को जीतने का प्रयास किया। उसने ब्रह्मा, विष्णु और शिव को चुनौती दी। जालंधर की पत्नी वृंदा पतिव्रता थी, जिसके पतिव्रत धर्म के कारण जालंधर को कोई भी पराजित नहीं कर सकता था।
तब भगवान विष्णु ने एक योजना बनाई और छलपूर्वक वृंदा का पतिव्रत भंग किया। इसके बाद जब जालंधर युद्ध में भगवान शिव के सामने आया, तो उसकी शक्ति क्षीण हो चुकी थी। अंततः भगवान शिव ने जालंधर का वध कर देवताओं को पुनः सुख-शांति प्रदान की।
अद्वैत वेदांत का संदेश: शिव ही परम सत्य
आचार्य श्री ने कथा प्रवचन के दौरान अद्वैत वेदांत की व्याख्या करते हुए कहा:
"सर्वं खल्विदं ब्रह्म" अर्थात यह संपूर्ण ब्रह्मांड ब्रह्म से ही उत्पन्न है।
उन्होंने बताया कि आदि शंकराचार्य ने अपने अद्वैत वेदांत में यह स्पष्ट किया कि यह संसार एक माया का खेल मात्र है, क्योंकि यह क्षण-क्षण बदलता रहता है। सत्य केवल परम ब्रह्म है, जो नित्य और अचल है।
भगवान श्रीकृष्ण ने भी महाभारत काल में अर्जुन को यही संदेश दिया था कि यह दृश्य जगत अस्थायी है। अतः जो भी होता है, वह केवल परमात्मा की इच्छा से होता है, और सभी जीवों में एक ही दिव्य शक्ति समाहित है।
महाशिवरात्रि पर विशेष आयोजन
महायज्ञ की पूर्णाहुति 26 फरवरी 2025, महाशिवरात्रि के शुभ अवसर पर होगी। इस दिन विशाल हवन एवं भंडारे का आयोजन किया जाएगा।सभी श्रद्धालुओं से सादर निवेदन है कि वे इस पावन कथा में सम्मिलित होकर शिव कृपा का आशीर्वाद प्राप्त करें।




