कैथा में श्रीशिवमहापुराण कथा का चौथा दिन रुद्र संहिता के सतीखंड और पार्वतीखंड का हो रहा वर्णन
(विंध्य वसुंधरा समाचार कैथा, रीवा (मप्र), 19 फरवरी 2025)
श्री हनुमान मंदिर प्रांगण, कैथा (गढ़/गंगेव) में चल रही श्रीशिवमहापुराण कथा के चौथे दिन श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। कथा में रुद्र संहिता के सतीखंड और पार्वतीखंड के दिव्य प्रसंगों का वर्णन किया गया।
सती का आत्मोत्सर्ग और पुनर्जन्म
कथावाचक ने बताया कि दक्षप्रजापति द्वारा आयोजित यज्ञ में भगवान शिव को आमंत्रित न करने पर माता सती अत्यंत व्यथित हुईं। बिना बुलाए यज्ञ में पहुंचने पर जब उन्होंने अपने पति भगवान शिव का अपमान होते देखा, तो स्वयं को यज्ञाग्नि में समर्पित कर दिया। यह दृश्य अत्यंत मार्मिक था, जिससे समूचा ब्रह्मांड शोकाकुल हो उठा।
कालांतर में, सती ने हिमालयराज के घर पार्वती रूप में पुनर्जन्म लिया। इधर, असुर तारकासुर का आतंक बढ़ता जा रहा था, जिससे चिंतित होकर देवगण भगवान ब्रह्मा की शरण में गए। ब्रह्मा जी ने उन्हें बताया कि केवल भगवान शिव और पार्वती के पुत्र के हाथों ही तारकासुर का वध संभव है।
पार्वती की तपस्या और शिव का वरदान
नारद मुनि के उपदेश से प्रेरित होकर माता पार्वती ने कठोर तपस्या की। उनकी भक्ति और तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी बनाने का संकल्प लिया।
कामदेव का भस्म होना
इंद्र ने शिवजी की घोर तपस्या भंग करने के लिए कामदेव को भेजा। शिवजी की समाधि भंग होने पर उन्होंने क्रोध में आकर कामदेव को भस्म कर दिया। बाद में, देवताओं की प्रार्थना पर उन्होंने रति को वरदान दिया कि उनके पति कामदेव का पुनर्जन्म होगा।
शिव: अजन्मा, अविनाशी और जगत के कल्याणकारी
कथा में बताया गया कि भगवान शिव अजन्मा, अविनाशी, महायोगी और त्यागमूर्ति हैं। वे त्रिगुणातीत हैं और संसार के कल्याण हेतु सदा तत्पर रहते हैं। शिव का अर्थ ही "कल्याणकारी" होता है। उनकी आराधना से जीवन में सत्य, अहिंसा, तप और त्याग की भावना विकसित होती है।
इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। आयोजन समिति ने सभी श्रद्धालुओं से निवेदन किया कि वे अधिक से अधिक संख्या में पधारकर इस दिव्य कथा का श्रवण करें और शिव कृपा प्राप्त करें।


