अवस्थातीत कालातीत आत्मा रूपी परमात्मा ही जानने योग्य है - डॉ. गौरीशंकर शुक्ला
पावन यज्ञस्थली कैथा में शिव महापुराण कथा का नौवां दिन, 26 फरवरी को महाशिवरात्रि पर हवन एवं भंडारे के साथ कार्यक्रम का होगा समापन
(विंध्य वसुंधरा समाचार रीवा, मप्र | 24 फरवरी 2025)
धार्मिक एवं आध्यात्मिक चेतना को जाग्रत करने हेतु यज्ञों की पावन स्थली कैथा स्थित अति प्राचीन हनुमान एवं शिव मंदिर प्रांगण में 11 दिवसीय शिवमहापुराण महायज्ञ का आयोजन किया जा रहा है। 24 फरवरी को इस कार्यक्रम का नौवां दिवस श्रद्धा और भक्ति की भावना से ओत-प्रोत रहा।
व्यासपीठ पर विराजमान प्रख्यात कथा वाचक डॉ. गौरीशंकर शुक्ला के मुखारविंद से पाप विनाशक, मोक्ष प्रदायक एवं अमृततुल्य शिव महापुराण कथा का रसास्वादन भक्तों को कराया जा रहा है। श्रद्धालु इस कथा का श्रवण कर स्वयं को धन्य मान रहे हैं तथा अपने जीवन को धर्ममय एवं सफल बनाने का संकल्प ले रहे हैं।
अवस्था और काल से परे आत्मा रूपी परमात्मा ही जानने योग्य है
डॉ. शुक्ला ने कथा वाचन के दौरान ईश्वरीय तत्व एवं शिव ज्ञान की महिमा पर प्रकाश डालते हुए बताया कि अवस्थातीत एवं कालातीत आत्मा रूपी परमात्मा ही सर्वोच्च एवं जानने योग्य है। उन्होंने विस्तार से समझाया कि:
जो काल अर्थात भूत, भविष्य एवं वर्तमान से परे है, उसे कालातीत कहा जाता है।
जो स्वप्न, जागृत एवं सुसुप्ति अवस्थाओं से परे है, वह अवस्थातीत कहलाता है।
यह विशेषताएँ केवल ईश्वर में ही संभव हैं।
उन्होंने उपनिषदों के उद्धरण देते हुए कहा कि आत्मा तुरीय अवस्था कहलाती है, जो किसी भी सांसारिक अवस्था से परे होती है। शास्त्रों में कहा गया है - सत्यम शिवम अद्वैतम चतुर्थ मन्यते स आत्मा स विज्ञेयः, अर्थात जो सत्य है, जो कल्याणकारी है, जो द्वैत भाव से मुक्त है और जो चतुर्थ अवस्था में स्थित है, वही आत्मा है और वही परमात्मा के तुल्य है।
मानव जीवन का सर्वोत्तम उद्देश्य अपने अंतर्मन में स्थित होकर आत्मा रूपी परमात्मा का ध्यान एवं साक्षात्कार करना होना चाहिए। श्रीमद्भगवद्गीता में भी आत्मा को अजर, अमर, शाश्वत एवं सनातन बताया गया है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्धभूमि में मोहपाश से मुक्त करने हेतु कहा था - "हे अर्जुन, जिन्हें तुम जीवित समझकर मोह में पड़े हुए हो, वे तो पहले से ही मृत हैं। जो जन्मा है, उसकी मृत्यु निश्चित है। अतः उनका शोक मत करो, जो शोक करने योग्य ही नहीं हैं।"
तात्पर्य यह है कि आत्मा ईश्वर का अंश है, जो न जन्म लेती है और न ही मरती है। अतः मृत्यु का शोक करना व्यर्थ है। जीवन की सच्चाई को समझते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए भवसागर से मुक्ति पाना ही मानव जीवन का परम लक्ष्य होना चाहिए। यह संसार एक मायाजाल है, जिसमें फँसकर जीव दुखी होता रहता है। अतः शोक एवं दुख का त्याग कर, आत्मबल को सुदृढ़ करते हुए आत्मचिंतन में लीन रहना चाहिए।
महाशिवरात्रि पर हवन-भंडारे के साथ होगा कार्यक्रम का समापन
शिवमहापुराण महायज्ञ के अंतर्गत 26 फरवरी को महाशिवरात्रि के शुभ अवसर पर विशाल हवन एवं भंडारे के साथ कार्यक्रम का विधिवत समापन होगा। इस अवसर पर सैकड़ों भक्तगण एवं श्रद्धालु एकत्रित होकर भगवान शिव की आराधना करेंगे।आयोजक मंडल ने सभी भक्तों एवं श्रद्धालुओं को इस दिव्य आयोजन में सम्मिलित होकर प्रसाद ग्रहण करने हेतु सादर आमंत्रित किया है। यह आयोजन न केवल आध्यात्मिक चेतना को जाग्रत कर रहा है, बल्कि समाज में धार्मिक मूल्यों एवं सांस्कृतिक धरोहर को पुनर्जीवित करने का कार्य भी कर रहा है।



