पावन यज्ञस्थली कैथा में शिवमहापुराण महायज्ञ का सातवां दिन - सतरुद्र संहिता के कथा प्रसंगों का चल रहा वर्णन
(विंध्य वसुंधरा समाचार गढ़ रीवा मध्यप्रदेश ) दिनांक: 22 फरवरी 2025,
लोककल्याण के निमित्त विषपान करने के कारण शिव कहलाए नीलकंठ भगवान
पावन यज्ञस्थली कैथा स्थित अति प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में दिनांक 16 फरवरी से आरंभ हुए शिवमहापुराण महायज्ञ का आयोजन 22 फरवरी को भी विधिवत रूप से जारी रहा। इस अवसर पर आचार्य श्री गौरीशंकर शुक्ला महाराज ने शिव लीला के विभिन्न कथा प्रसंगों पर प्रकाश डाला।
श्रीशिवमहापुराण के विध्येश्वर और रुद्र संहिता के कथा प्रसंगों के उपरांत सतरुद्र संहिता पर प्रवचन चल रहा है, जिसमें शौनक मुनि द्वारा सूतजी से सद्योजात, वामदेव आदि अवतारों की कथा सुनने की जिज्ञासा, अर्धनारीश्वर की उत्पत्ति, भवानी का दक्ष के घर जन्म, द्वापर युग में श्वेत मुनि के रूप में शिव अवतार और उनके शिष्यों का वर्णन, दसवें से अट्ठाईसवें द्वापर तक शिवजी के विभिन्न अवतारों का वर्णन किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त शिलादि मुनि द्वारा शिव की घोर तपस्या से नंदी का जन्म और गणपत्य पद प्राप्ति, दधीचि के तप से प्रसन्न होकर शिव द्वारा वरदान, पिप्पलाद मुनि के रूप में शिव अवतार, महानंदा वेश्या के तप से शिव का वैश्यनाथ अवतार, कालभैरव द्वारा ब्रह्मा का अभिमान नष्ट करना, वीरभद्र द्वारा नृसिंह का अभिमान नष्ट करना आदि पौराणिक कथा प्रसंगों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया जा रहा है।
लोककल्याण के निमित्त विषपान करने के कारण शिव कहलाए नीलकंठ भगवान
शिव त्याग और कल्याण का दूसरा नाम हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान 14 रत्न प्राप्त हुए। तेरह रत्नों को देवता एवं असुरों ने आपस में बांट लिया, किंतु जब मंथन से हलाहल विष निकला तो सम्पूर्ण सृष्टि विनाश के कगार पर पहुंच गई। ब्रह्मा और विष्णु के सामने सृष्टि को बचाने का संकट उत्पन्न हो गया। इस विष को कौन धारण करेगा, यह प्रश्न उठने पर सभी देवता एवं असुरगण भगवान शिव के समक्ष उपस्थित हुए। शिवजी ने सृष्टि के आरंभिक चरण में ही इसके संभावित विनाश को देखते हुए लोककल्याण हेतु स्वयं हलाहल विष को धारण कर लिया।
भयंकर विष को गले में धारण करने के कारण शिवजी का कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए। भगवान शिव के इस महान त्याग से प्रेरणा लेते हुए प्रत्येक व्यक्ति को परहित का भाव रखना चाहिए तथा अपनी इच्छाओं और वासनाओं का त्याग कर, जनकल्याण के लिए कार्य करना चाहिए।
भक्तों के लिए विशेष निमंत्रण
पापविनाशक और मोक्षप्रदायक श्री शिवमहापुराण कथा के श्रवण हेतु समस्त भक्तों एवं श्रद्धालुओं को सादर आमंत्रित किया गया है। महायज्ञ का समापन हवन एवं विशाल भंडारे के साथ दिनांक 26 फरवरी, महाशिवरात्रि के दिन किया जाएगा।




