होली का उत्सव, पुलिस की देरी और मऊगंज की भयावह घटना: क्या प्रशासन लेगा सबक?
विशेष रिपोर्ट विंध्य वसुंधरा समाचार रीवा/मऊगंज
मध्य प्रदेश में वर्षों से यह परंपरा चली आ रही है कि होली के दिन आम नागरिक त्योहार मनाते हैं, जबकि अगले दिन पुलिसकर्मी होली खेलते हैं। यह कोई संवैधानिक नियम नहीं, बल्कि एक सामाजिक परंपरा है। लेकिन क्या कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी निभाने वालों के लिए यह परंपरा सही है?
15 मार्च 2025 को मऊगंज जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र में हुई हिंसक घटना ने इस सवाल को और गंभीर बना दिया है। पुलिस की देरी, प्रशासन की लापरवाही और व्यवस्था की कमियों के चलते एक पुलिसकर्मी की जान चली गई और कई पुलिस एवं राजस्व अधिकारी गंभीर रूप से घायल हो गए।
कैसे शुरू हुआ विवाद?
सुबह 10:00 बजे: शनि उर्फ राहुल द्विवेदी (33 वर्ष, पिता डॉ. रजनीश द्विवेदी) गांव के कुछ आदिवासी युवकों के साथ चला गया।
सुबह 11:00 बजे: उनके पिता ने फोन लगाया, लेकिन मोबाइल बंद मिला।
दोपहर 12:00 बजे: परिवार ने तलाश शुरू की और पता चला कि राहुल को गांव के कुछ आदिवासी युवक अपने घर ले गए थे।
जब परिवार मौके पर पहुंचा, तो विवाद बढ़ गया। किसी तरह खुद को बचाकर वे घर लौटे और दोपहर 2:00 बजे रायपुर थाना पुलिस को सूचना दी।
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| मृतक के पिता |
डीजे की धुन में खोया प्रशासन, फोन कॉल्स नहीं सुन पाए अधिकारी?
जब पुलिस को सूचना दी गई, तब जिले के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी और प्रशासनिक अधिकारी होली मिलन समारोह में व्यस्त थे।
सूत्रों के अनुसार, मऊगंज कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक खुद डीजे की धुन पर थिरकते नजर आए। इसी दौरान प्रतिबंधित डीजे की तेज आवाज से शायद वरिष्ठ अधिकारियों को मोबाइल की घंटी सुनाई ही नहीं दी।
यह सवाल उठता है कि क्या इसी कारण पुलिस बल समय पर नहीं भेजा गया?
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| मऊगंज कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक |
पुलिस बल की कमी और सूर्यास्त बना घटना का कारण
समय बीतता गया, लेकिन पुलिस ने स्थिति को गंभीरता से नहीं लिया। दोपहर 2:30 बजे महज चार पुलिसकर्मी मौके पर पहुंचे। हालात बिगड़ते देख उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों को सूचित किया, लेकिन पुलिस बल बढ़ाने में अत्यधिक देरी हुई।
सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब दोपहर में ही स्थिति तनावपूर्ण हो गई थी, तो सूर्यास्त से पहले ही पुलिस बल क्यों नहीं भेजा गया?
क्या डीजे की तेज धुन और होली समारोह में व्यस्त अधिकारी फोन नहीं उठा सके?
क्या पुलिस बल की भारी कमी थी, या फिर प्रशासन हालात को समझने में नाकाम रहा?
जांच के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि फोन रिसीव करने में देरी हुई या फिर व्यवस्था में कोई और गड़बड़ी थी।
जब पुलिस पहुंची तो हमला हो चुका था
जब तक पुलिस बल मौके पर पहुंचा, तब तक स्थिति पूरी तरह से नियंत्रण से बाहर हो चुकी थी।
शाम 7:00 बजे: करीब 50-60 पुलिसकर्मी और राजस्व अधिकारी पहुंचे।
वहां 500 से अधिक हरिजन और आदिवासी समुदाय के लोग पहले से मौजूद थे।
स्थिति इतनी बिगड़ चुकी थी कि भीड़ ने पुलिस और राजस्व अधिकारियों पर तलवारों, डंडों और अन्य हथियारों से हमला कर दिया।
इस हमले में एक पुलिसकर्मी की मौत हो गई और कई पुलिस एवं राजस्व अधिकारी गंभीर रूप से घायल हो गए।
घायलों को अस्पताल ले जाया गया, जहां कई अधिकारियों को संजय गांधी अस्पताल, रीवा रेफर किया गया।
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| घायल पुलिस कर्मी |
क्या प्रशासन इस घटना से सबक लेगा?
रात 8:00 बजे तक पूरी घटना की जानकारी उच्च अधिकारियों को मिल चुकी थी, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन इस घटना से कोई सबक लेगा?
क्या भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे?
एक सेकंड की देरी, कई जिंदगियां दांव पर
यह सच है कि पुलिसकर्मी और राजस्व विभाग के अधिकारी भी समाज का हिस्सा हैं और उन्हें भी त्योहार मनाने का अधिकार है। लेकिन देश की सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक सेवाओं की जिम्मेदारी ऐसी है कि एक सेकंड की भी लापरवाही से कई जिंदगियां खतरे में पड़ सकती हैं।
यह घटना प्रशासन और पुलिस व्यवस्था के लिए एक चेतावनी है।
अब जांच से यह सामने आएगा कि इस घटना में किसकी लापरवाही थी, किसकी गलती थी और कौन दोषी है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या प्रशासन ऐसी घटनाओं से सबक लेकर भविष्य में इन्हें रोकने के लिए कारगर कदम उठाएगा?





