मेडिकल नशे का बढ़ता कारोबार: रीवा और मऊगंज में प्रशासन की बड़ी चुनौती
विंध्य वसुंधरा समाचार रीवा/मऊगंज मध्यप्रदेश 2 मार्च 2025
हर साल 31 मार्च को वित्तीय वर्ष का समापन होता है, और यह केवल आर्थिक लेखा-जोखा करने का समय नहीं होता, बल्कि समाज में व्याप्त समस्याओं की भी समीक्षा करने का अवसर होता है। बीते कुछ वर्षों में एक गंभीर समस्या ने समाज को जकड़ लिया है – मेडिकल नशे का बढ़ता कारोबार। यह न केवल युवाओं को नष्ट कर रहा है, बल्कि कानून और प्रशासन के लिए भी बड़ी चुनौती बन चुका है।
रीवा और मऊगंज जिले में मेडिकल नशे का व्यापार चरम पर है। अवैध रूप से बेचे जाने वाले नशीले सिरप, इंजेक्शन और अन्य दवाएं युवाओं को बर्बाद कर रही हैं। प्रशासन की लापरवाही या मिलीभगत के कारण यह धंधा लगातार फल-फूल रहा है। पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की निष्क्रियता, कुछ भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत और राजनीतिक संरक्षण के कारण इस अवैध कारोबार पर रोक लगाना मुश्किल होता जा रहा है।
मेडिकल नशे का फैलता जाल
पहले केवल शराब और गांजे जैसे नशे का बोलबाला था, लेकिन अब मेडिकल नशे ने अपनी जड़ें गहरी जमा ली हैं। नशे के सौदागर अब कोडीन सिरप, ट्रामाडोल, अल्प्राजोलम, इंजेक्शन और अन्य प्रतिबंधित दवाओं को धड़ल्ले से बेच रहे हैं। युवा पीढ़ी इन नशीली दवाओं की गिरफ्त में फंसती जा रही है।
रीवा जिले में गढ़, कटरा, लोरी, लालगांव और अन्य इलाकों में मेडिकल नशे की सबसे ज्यादा बिक्री हो रही है। इन जगहों पर अवैध नशे के अड्डे खुलेआम संचालित हो रहे हैं, जहां किशोर और युवा आसानी से नशे का सामान खरीद सकते हैं।
कैसे होता है मेडिकल नशे का व्यापार?
1. दवा दुकानों की आड़ में – कुछ मेडिकल स्टोर अवैध रूप से ये दवाएं बेचते हैं और रिकॉर्ड में गड़बड़ी कर देते हैं।
2. हरियाणा, छत्तीसगढ़ और यूपी से आपूर्ति – ये नशीली दवाएं हरियाणा और अन्य राज्यों से लाकर रीवा और आसपास के जिलों में बेची जाती हैं।
3. रात के समय सप्लाई – रात 11 बजे से सुबह 3 बजे तक यह धंधा सबसे ज्यादा चलता है, जिससे पुलिस की नजरों से बचा जा सके।
4. राजनीतिक संरक्षण और अधिकारियों की मिलीभगत – नशा कारोबारी नेताओं के साथ अपनी तस्वीरें दिखाकर खुद को सुरक्षित साबित करने की कोशिश करते हैं।
5. व्हाट्सएप और मोबाइल नेटवर्क का उपयोग – नशे की खेप को सुरक्षित ठिकानों तक पहुंचाने के लिए व्हाट्सएप और अन्य डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल किया जाता है।
कुंभ मेले के दौरान बढ़ा कारोबार
माघ मेले के दौरान पूरा प्रशासन सुरक्षा व्यवस्था में व्यस्त था। इस मौके का फायदा उठाकर नशा माफिया ने बड़ी मात्रा में मेडिकल नशे की खेप रीवा और मऊगंज में इकट्ठा कर ली। अब वही नशा खुलेआम गांवों में बेचा जा रहा है।
पुलिस द्वारा वाहनों की सघन जांच न किए जाने से अवैध दवाओं की आपूर्ति बेरोकटोक जारी रही। अब हालात यह हैं कि ये माफिया बेखौफ होकर धंधा चला रहे हैं और प्रशासन मौन बना हुआ है।
प्रशासन की उदासीनता और भ्रष्टाचार
मेडिकल नशे के इस बढ़ते कारोबार के पीछे प्रशासन की लापरवाही और कुछ भ्रष्ट अधिकारियों की संलिप्तता भी एक बड़ा कारण है।
स्वास्थ्य विभाग – मेडिकल स्टोर्स और क्लीनिकों की नियमित जांच नहीं होती, जिससे प्रतिबंधित दवाएं आसानी से बेची जाती हैं।
पुलिस विभाग – कुछ पुलिसकर्मी नशा माफियाओं से पैसा लेकर उनके धंधे को नजरअंदाज कर देते हैं।
राजनीतिक संरक्षण – कई बार प्रभावशाली लोगों की संलिप्तता के कारण प्रशासन पर दबाव बना रहता है और दोषियों पर कार्यवाही नहीं हो पाती।
कैसे हो सकती है पहचान?
यदि लाइसेंसी शराब दुकानों के रजिस्टरों और मेडिकल स्टोर्स की बिक्री रिपोर्ट की गहन जांच की जाए, तो कई बड़े नाम सामने आ सकते हैं। मोबाइल डेटा विश्लेषण और कॉल रिकॉर्डिंग से भी इस नेटवर्क का भंडाफोड़ किया जा सकता है।
सरकार और प्रशासन की चिंता
मध्य प्रदेश सरकार और रीवा के वरिष्ठ नेता इस मुद्दे पर गंभीर हैं। रीवा विधायक एवं उप मुख्यमंत्री मध्यप्रदेश राजेंद्र शुक्ला इस संबंध में उत्तर प्रदेश सरकार से चर्चा कर चुके हैं। लेकिन, जब तक स्थानीय स्तर पर कठोर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक इस अवैध धंधे को रोक पाना मुश्किल है।
मेडिकल नशे की शुरुआत 2010 के बाद तेजी से हुई और पिछले 15 वर्षों में यह अपने चरम पर पहुंच चुका है। अब हालात यह हो गए हैं कि 18 साल के युवा 70 साल के वृद्धों की तरह जीने को मजबूर हो रहे हैं।
अब क्या किया जाए? समाधान के सुझाव
1. गोपनीय जांच टीम का गठन – प्रशासन को बाहर के अधिकारियों की एक गोपनीय टीम बनानी चाहिए जो स्थानीय स्तर पर जांच करे।
2. नशीली दवाओं की बिक्री पर सख्त नियंत्रण – मेडिकल स्टोर्स और फार्मेसियों की सख्त जांच होनी चाहिए।
3. मोबाइल डेटा और कॉल रिकॉर्ड की जांच – इस धंधे में शामिल लोगों के मोबाइल नंबरों की पड़ताल से बड़े नाम उजागर किए जा सकते हैं।
4. रात में विशेष अभियान – रात 11 बजे से सुबह 3 बजे तक पुलिस को विशेष अभियान चलाकर छापेमारी करनी चाहिए।
5. आरोपियों को कड़ी सजा – जो भी व्यक्ति नशे के इस अवैध व्यापार में लिप्त पाया जाए, उसे कठोर दंड दिया जाए, चाहे वह कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो।
6. जन जागरूकता अभियान – स्कूलों, कॉलेजों और गांवों में नशे के खिलाफ बड़े स्तर पर अभियान चलाया जाए ताकि युवा जागरूक हो सकें।
मेडिकल नशे का बढ़ता कारोबार एक गंभीर सामाजिक और प्रशासनिक समस्या बन चुका है। यदि अभी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां इस जहर का शिकार हो जाएंगी। सरकार, प्रशासन और आम जनता को मिलकर इस बुराई के खिलाफ लड़ना होगा। केवल कागजी कार्रवाई से कुछ नहीं होगा, जब तक इसे जमीनी स्तर पर सख्ती से लागू नहीं किया जाता।
अब समय आ गया है कि प्रशासन दिखावटी कार्रवाई की बजाय ठोस कदम उठाए और इस अवैध व्यापार की जड़ें उखाड़ फेंके। अगर रीवा और मऊगंज में गोपनीय जांच कर सही अपराधियों को पकड़ा जाए, तो नशा माफियाओं की कमर तोड़ी जा सकती है और भविष्य की पीढ़ियों को इस जहर से बचाया जा सकता है।



