प्राकृतिक संसाधनों का दोहन: मानवता के भविष्य पर संकट
विंध्य वसुंधरा की विशेष रिपोर्ट रीवा मध्यप्रदेश 2मार्च 2025
धरती पर बढ़ती गर्मी, सूखते जल स्रोत, कटते जंगल और घटता हरियाली का दायरा, यह सब आने वाले समय में एक भीषण जल संकट की ओर संकेत कर रहे हैं। 2025 का जून और जुलाई महीना इतिहास की सबसे विकराल गर्मी लेकर आएगा, जिसमें मनुष्य ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षी और समूची जैव विविधता त्राहिमाम करेगी।
भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है, नदियां सूख रही हैं, और जंगलों का सफाया हो रहा है। स्वतंत्रता सेनानियों ने जिस भारत को आज़ाद करवाने का सपना देखा था, शायद वे यह जानते कि आज़ादी के बाद जनता के प्रतिनिधि खुद ही इस देश की प्राकृतिक संपदा को बेच देंगे, तो शायद वे इतने बड़े जन आंदोलन के लिए आगे न आते।
आजादी के बाद जिस तरह से प्राकृतिक संसाधनों की लूट मची है, वह ब्रिटिश राज से भी अधिक खतरनाक साबित हो रही है। हमारे पूर्वजों ने तालाब, कुएं, बावड़ी और घने जंगलों की जो प्राकृतिक विरासत छोड़ी थी, उसे आधुनिक विकास के नाम पर नष्ट किया जा रहा है।
जंगलों की कटाई: धरती के हरे वस्त्र छीन लिए गए
भारत में जंगलों की पवित्रता को हमेशा से पूजा गया है। सनातन धर्म में पीपल, बरगद, आम और नीम जैसे वृक्षों को पूजनीय माना गया, क्योंकि ये न केवल धार्मिक महत्व रखते थे बल्कि पर्यावरण को संतुलित रखने में अहम भूमिका निभाते थे।
लेकिन आज, इन वृक्षों की संख्या तेजी से घट रही है। वन माफियाओं द्वारा अवैध कटाई ने जंगलों को वीरान कर दिया है। जहां कभी घने जंगल होते थे, अब वहां कंक्रीट की ऊंची इमारतें खड़ी हो गई हैं। जंगलों की जड़ें वर्षा जल को भूमि के अंदर पहुंचाने में सहायक होती थीं, लेकिन इनके विनाश के कारण भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है।
नदियों से अवैध उत्खनन: जल स्रोतों का विनाश
भारत की नदियों को जीवनदायिनी कहा जाता था, लेकिन अब यही नदियां सूखने की कगार पर हैं। बालू और पत्थरों का अवैध खनन करके नदियों की कोख को गहरा कर दिया गया है, जिससे उनमें पानी का ठहराव खत्म हो गया। परिणामस्वरूप, नदियां अब बारिश के पानी को संचित नहीं कर पा रही हैं और जल स्तर हर साल नीचे जाता जा रहा है।
तालाबों और कुओं का समतलीकरण: जल संरक्षण की विफलता
पहले के समय में गांवों में बड़े-बड़े तालाब और जलाशय बनाए जाते थे, जो बारिश के पानी को संचित करके भूजल स्तर बनाए रखने में मदद करते थे। लेकिन अब इन तालाबों को समतल करके वहां पर मकान, सरकारी दफ्तर और निजी इमारतें बना दी गई हैं।
गांवों के जल स्रोतों को समाप्त कर दिया गया है, जिससे पानी का संकट और गहरा गया है। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि कई गांवों में अब पीने के पानी तक के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
सरकार की "हरियाली प्रोजेक्ट" और "वॉटरशेड मिशन" जैसी योजनाएं सिर्फ कागजों में रह गई हैं। अरबों रुपये इन योजनाओं में खर्च हुए, लेकिन वास्तविकता में कहीं भी कोई जल स्रोत विकसित नहीं किए गए। भ्रष्टाचार के कारण यह धन ठेकेदारों, अधिकारियों और नेताओं की जेबों में चला गया।
हैंडपंप और कुएं भी सूख रहे हैं
सरकार ने जल संकट से निपटने के लिए हजारों हैंडपंप और कुएं खोदने का दावा किया, लेकिन इनमें से अधिकतर या तो सूख चुके हैं या शुरू से ही अनुपयोगी हैं। कारण यह है कि भूमिगत जल पुनर्भरण (रिचार्ज) की कोई व्यवस्था नहीं की गई।
प्राकृतिक जल संरक्षण प्रणाली का विनाश
पहले खेतों में "मेड बंधन" बनाए जाते थे, जिससे बारिश का पानी बहकर बर्बाद न हो और भूमि के अंदर समा जाए। लेकिन अब यह प्रणाली भी समाप्त हो गई है। खेतों में अत्यधिक दोहन और अवैध निर्माण के कारण वर्षा जल संचित नहीं हो पा रहा है।
पुराने वृक्षों का विनाश, नए वृक्षों का व्यावसायीकरण
वृक्षारोपण के नाम पर सिर्फ आंकड़ों की बाजीगरी की जा रही है। पुराने बीजू वृक्ष (जो बीज से विकसित होते हैं) की जगह अब फार्म हाउसों में कलमी वृक्ष (जो शाखा से उगाए जाते हैं) लगाए जा रहे हैं। यह वृक्ष जितनी तेजी से बढ़ते हैं, उतनी ही जल्दी इनका जीवन समाप्त हो जाता है। इनका पर्यावरणीय संतुलन में कोई विशेष योगदान नहीं होता। सड़क किनारे लगे पीपल, बरगद, आम और अन्य छायादार वृक्षों की कटाई कर दी गई है। राष्ट्रीय राजमार्गों पर अब आपको कोई बड़ा वृक्ष नजर नहीं आएगा। यदि यही हाल रहा, तो अगले पांच वर्षों में सड़क किनारे हरियाली पूरी तरह से समाप्त हो जाएगी।
जल संकट और बढ़ती बीमारियां
जल संकट केवल पानी की कमी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर लोगों के स्वास्थ्य पर भी पड़ेगा। भूजल स्तर के गिरने से दूषित जल की समस्या बढ़ेगी, जिससे टाइफाइड, पेचिश, डायरिया और फ्लोराइड जैसी गंभीर बीमारियां फैलेंगी। पशु-पक्षियों पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ेगा। तालाबों और झीलों के सूखने से जलचर प्रजातियां विलुप्त हो जाएंगी। जंगलों की कमी से जंगली जीव आबादी वाले इलाकों में आ जाएंगे, जिससे मानव-पशु संघर्ष की घटनाएं बढ़ेंगी।
क्या होगा भविष्य में?
यदि हमने अभी भी प्राकृतिक संसाधनों का दोहन नहीं रोका और जल संरक्षण को प्राथमिकता नहीं दी, तो आने वाले वर्षों में हालात और भी भयावह हो जाएंगे। हमें जल संचयन, वृक्षारोपण और प्राकृतिक जल स्रोतों के पुनर्जीवन की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे।
अगली रिपोर्ट में:
हम "जल जीवन मिशन" की वास्तविकता पर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करेंगे क्या यह सिर्फ कागजी योजना बनकर रह गई? या इसके पीछे कोई ठोस प्रयास किए जा रहे हैं? पाइप बनाने वाली कंपनियां, ठेकेदार, नेता और अधिकारी किस तरह इस मिशन को प्रभावित कर रहे हैं? इन सभी सवालों के जवाब जानने के लिए पढ़ते रहिए हमारी विशेष रिपोर्ट।









