रीवा जिले के खरीदी केंद्रों में घोटालों की फसल! लोरी गढ़ खरीदी केंद्र पर ठेकेदारी के नाम पर हो रहा करोड़ों का खेल, चौकीदार बना संपत्ति का मालिक, प्रशासन मौन
विंध्य वसुंधरा समाचार रीवा, मध्यप्रदेश
रीवा जिले में गेहूं खरीदी का कार्य प्रारंभ होते ही पुराने आरोप एक बार फिर सुर्खियों में आ गए हैं। लोरीगढ़ और मऊगंज क्षेत्र के खरीदी केंद्रों में वर्षों से चल रही ठेकेदारी व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। किसानों के हक की खरीदी व्यवस्था अब भ्रष्टाचार का अड्डा बनती जा रही है, जहां बिना किसी कानूनी आधार और पारदर्शिता के खरीद प्रक्रिया संचालित की जा रही है।
चौकीदार से करोड़पति बनने की कहानी, खुली चुनौती व्यवस्था को
लोरीगढ़ खरीदी केंद्र पर पिछले 10–15 वर्षों से कार्यरत समिति का चौकीदार गणेश द्विवेदी आज चर्चा का विषय बना हुआ है। सरकारी रिकॉर्ड में आज भी गरीबी रेखा के नीचे दर्ज यह व्यक्ति अब भारी-भरकम चल-अचल संपत्तियों का मालिक बन चुका है। स्थानीय ग्रामीणों और समिति के सदस्यों के अनुसार, उसके भाई आज भी सामान्य आर्थिक स्थिति में हैं, लेकिन राम गणेश की जीवनशैली और संपत्ति पर नजर डालें तो मामला आय से अधिक संपत्ति का प्रतीत होता है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि बिना किसी शैक्षणिक योग्यता और तकनीकी ज्ञान के बावजूद उसे वर्षों पूर्व समिति के विक्रेता पद पर भी रखा गया, जो आज भी सहकारिता न्यायालय में विचाराधीन है। बावजूद इसके, समिति और संबंधित अधिकारियों द्वारा उसे लगातार खरीद प्रक्रिया में शामिल रखा गया।
खरीदी केंद्र बना कमाई का अड्डा, टोल और सेवा शुल्क की खुली लूट
खरीदी केंद्रों पर किसान जहां समय पर समर्थन मूल्य पर फसल बेचने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर समिति के कर्मचारी मनमाने तरीके से टोल और सेवा शुल्क के नाम पर वसूली कर रहे हैं। किसानों से गेहूं में ₹10 प्रति क्विंटल, धान में ₹12-₹13 प्रति क्विंटल और ट्रैक्टर लाइन में नंबर लगाने के लिए ₹500 तक की अवैध राशि ली जा रही है।
वहीं यह भी सामने आया है कि खाद वितरण में भी पारदर्शिता नहीं बरती जा रही है। चर्चा यह भी है कि खाद की हर बोरी से 'पर्कही' निकाल कर अवैध रूप से बेची जाती है, जिससे करोड़ों की अवैध कमाई होती है।
प्रशासनिक मिलीभगत और कार्रवाई का अभाव
पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यह है कि संबंधित अधिकारियों और समिति प्रबंधकों की भूमिका क्या है? क्या यह सब उनकी अनदेखी में हो रहा है या अप्रत्यक्ष सहमति प्राप्त है? जब हर खरीदी केंद्र पर दर्जनों कर्मचारी मौजूद होते हैं, तो अकेला चौकीदार यह सब कैसे कर सकता है?
इतना ही नहीं, उक्त चौकीदार के कार्यकाल में समिति में चोरी की घटनाएं भी हो चुकी हैं, लेकिन उसके खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई आज तक नहीं हुई। बल्कि इसके विपरीत, उसे लगातार प्रमोशन मिलता गया।
अब सवाल यह है कि प्रशासन कब जागेगा?
यह स्थिति केवल लोरीगढ़ या मऊगंज तक सीमित नहीं है। जिले के कई केंद्रों में इसी प्रकार की व्यवस्था देखने को मिल रही है। ऐसे में जिला कलेक्टर रीवा, संभागीय आयुक्त, सहकारिता विभाग और आवश्यक वस्तु अधिनियम के अंतर्गत गठित टीमें यदि गंभीरता से जांच करें, तो करोड़ों के घोटाले उजागर हो सकते हैं।
यह आवश्यक हो गया है कि:
संबंधित चौकीदार व विक्रेता की संपत्ति और आय का मूल्यांकन किया जाए।
खरीदी केंद्रों में लगे सभी ठेकेदारों और कर्मचारियों की जांच कर पारदर्शी व्यवस्था लागू की जाए।
लोकायुक्त या आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW) जैसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाए।
किसानों से हो रही वसूली की रकम का लेखा-जोखा सार्वजनिक किया जाए।
सरकार द्वारा किसानों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से बनाई गई खरीदी नीति, भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। अब देखना यह है कि रीवा प्रशासन, सहकारिता विभाग और शासन इस मामले में कितना सजग और सक्रिय होकर कार्यवाही करता है, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।



