शासकीय स्कूल बना प्याज का गोदाम: कक्षाएं बदहाल, बच्चों के भविष्य से खिलवाड़
कक्षा में शिक्षा नहीं, प्याज की बोरियाँ! प्रशासनिक लापरवाही से ग्रामीणों में आक्रोश
वसुंधरा समाचार रीवा मध्यप्रदेश
रीवा, ओढ़की खुर्द — शिक्षा के मंदिर कहे जाने वाले स्कूलों की स्थिति आज किस कदर बदहाल हो चुकी है, इसका जीता-जागता उदाहरण रीवा जिले की शासकीय प्राथमिक पाठशाला, ओढ़की खुर्द में देखने को मिला। यहां कक्षाएं छात्रों से नहीं, बल्कि प्याज की बोरियों से भरी हुई हैं। स्कूल परिसर को शैक्षणिक गतिविधियों की बजाय अब भंडारण केंद्र बना दिया गया है।
प्राचार्य के निर्देश पर गोदाम में तब्दील हुआ स्कूल!
सूत्रों की मानें तो स्कूल को प्याज के अस्थायी गोदाम में तब्दील करने का निर्णय खुद स्कूल प्राचार्य के निर्देश पर लिया गया है। यह न सिर्फ प्रशासनिक स्वेच्छाचारिता को उजागर करता है, बल्कि सरकारी जवाबदेही की भी पोल खोलता है।
15 जून से खुलने हैं स्कूल, लेकिन बैठने तक की जगह नहीं
गर्मी अवकाश के बाद आगामी 15 जून से स्कूल पुनः खुलने वाला है, लेकिन विद्यालय की वर्तमान स्थिति को देखकर यह सवाल उठना लाज़मी है कि छात्र आखिर कहां बैठेंगे? क्या उन्हें अब प्याज की बोरियों पर बैठकर शिक्षा ग्रहण करनी होगी?
अभिभावकों और ग्रामीणों में फूटा गुस्सा
विद्यालय की स्थिति देखकर अभिभावकों और ग्रामीणों में रोष व्याप्त है। कई स्थानीय लोगों ने स्कूल पहुंचकर विरोध प्रदर्शन किया और उच्चाधिकारियों से तत्काल कार्रवाई की मांग की। उनका कहना है कि यह बच्चों के भविष्य के साथ गंभीर खिलवाड़ है, जिसे किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
कानून और नियमों का उल्लंघन
यह कृत्य न केवल नैतिक रूप से आपत्तिजनक है, बल्कि यह अनेक नियमों और अधिनियमों का उल्लंघन भी है:
शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE Act): धारा 8(1)(d) के अंतर्गत विद्यालयों में सुरक्षित और स्वच्छ वातावरण देना अनिवार्य है।
IPC की धारा 188: सरकारी आदेशों की अवहेलना।
IPC की धारा 269: जनस्वास्थ्य को संकट में डालना।
मप्र शिक्षा विभाग आदेश: स्कूल परिसर का गैर-शैक्षणिक उपयोग वर्जित है।
प्रशासनिक चुप्पी सवालों के घेरे में
अब तक ना तो जनपद शिक्षा अधिकारी और ना ही खंड शिक्षा अधिकारी द्वारा कोई बयान सामने आया है। अधिकारियों की चुप्पी से इस बात को बल मिलता है कि कहीं न कहीं लापरवाही या मिलीभगत की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता।
ग्रामीणों की स्पष्ट मांग
स्थानीय लोगों ने शासन-प्रशासन से मांग की है कि—
1. उच्च स्तरीय जांच कराकर दोषियों पर कड़ी विभागीय व कानूनी कार्रवाई की जाए।
2. विद्यालय परिसर को तुरंत खाली कर शिक्षा योग्य वातावरण बहाल किया जाए।
3. भविष्य में विद्यालयों को निजी या व्यावसायिक हितों के लिए उपयोग से रोका जाए।
जहां एक ओर सरकार शिक्षा के अधिकार को सशक्त बनाने के लिए करोड़ों रुपए खर्च कर रही है, वहीं दूसरी ओर ऐसे उदाहरण पूरे तंत्र की गंभीर विफलता को उजागर करते हैं। यह न सिर्फ शिक्षा व्यवस्था की साख पर प्रश्नचिन्ह है, बल्कि मासूम बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ भी है — जिसे तत्काल रोका जाना चाहिए।


