रीवा-मऊगंज में निशुल्क खाद्यान्न योजना में भारी घोटाला! हितग्राहियों का हक लूट रहे राशन माफिया – शासन मौन
रीवा, मऊगंज (विशेष रिपोर्ट विंध्य वसुंधरा समाचार )
प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी "निशुल्क खाद्यान्न योजना", जो गरीबों को भूखमरी से बचाने के उद्देश्य से चलाई जा रही है, मध्यप्रदेश के रीवा और मऊगंज जिले में भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। शासन द्वारा पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए नियमों को खुलेआम ठेंगा दिखाया जा रहा है, और खाद्यान्न वितरण की पूरी व्यवस्था एक सुनियोजित "राशन माफिया नेटवर्क" में तब्दील हो गई है।
पोषण सुरक्षा नहीं, मुनाफाखोरी का अड्डा बन रही राशन दुकानें
पात्र हितग्राहियों को उचित मूल्य की दुकान से अनाज प्राप्त करने के लिए POS मशीन में अंगूठे का सत्यापन जरूरी है, परन्तु जिले की अनेक दुकानों पर पहले अंगूठा लगवा लिया जाता है और उसके बाद अनाज की मात्रा मनमाने तरीके से दी जाती है। हितग्राहियों को यह भी नहीं बताया जाता कि उन्हें कितनी मात्रा का खाद्यान्न मिलना चाहिए था और कितना मिला। कहीं पर चावल कम तो कहीं गेहूं में कटौती—यह गड़बड़ी अब सिस्टम का हिस्सा बन चुकी है।
बोरियों का वजन 50 किलो नहीं, 54 किलो तक – गोदाम से लेकर वितरण तक भ्रष्टाचार का खेल
जांच में सामने आया है कि गोदामों से निकलने वाली बोरियों का वजन 52 से 54 किलो तक होता है, जबकि शासन द्वारा निर्धारित वजन 50 किलो है। सवाल यह है कि अतिरिक्त वजन की बोरियों का हिसाब कौन रख रहा है? क्या यह अतिरिक्त अनाज हितग्राहियों तक पहुंचता है या फिर माफियाओं के गोदामों में खपाया जा रहा है? यदि रोज़ 10,000 बोरी निकली और हर बोरी में 4 किलो अतिरिक्त रहा, तो प्रतिदिन 40,000 किलो अनाज कहां जा रहा है?
10 से 15 कुंटल राशन प्रतिमाह दुकानदारों द्वारा हजम किए जाने के आरोप
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने खुलासा किया है कि प्रत्येक उचित मूल्य दुकान पर प्रतिमाह 10 से 15 कुंटल खाद्यान्न गुप्त रूप से गायब कर दिया जाता है। यह खाद्यान्न या तो बिचौलियों को बेचा जाता है या स्थानीय व्यापारियों के माध्यम से कालाबाजारी के नेटवर्क में खपाया जाता है।
विक्रेताओं की योग्यता शून्य, पर भ्रष्टाचार में सौ प्रतिशत सक्रिय
विक्रेताओं की भर्ती प्रक्रिया में मापदंडों की धज्जियां उड़ रही हैं। एक विक्रेता की मासिक आय अधिकतम ₹11,000 होनी चाहिए, लेकिन वे ₹16,000 तक का खर्च कर्मचारियों और अन्य सुविधाओं पर कर रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि यह अतिरिक्त पैसा कहां से आ रहा है? क्या यह हितग्राहियों के हिस्से का राशन बेचकर जुटाया जा रहा है?
POS मशीन से अंगूठा लगवा कर कागज़ पर वितरण – असल में चोरी
कई दुकानों पर अंगूठा लगाकर केवल रिकॉर्ड में राशन वितरण दर्शाया जा रहा है, जबकि हकीकत में हितग्राही को खाद्यान्न नहीं दिया जा रहा। ऐसे वीडियो और शिकायती पत्र अब सोशल मीडिया पर वायरल हो चुके हैं। क्या प्रशासन इन शिकायतों को नजरअंदाज कर रहा है, या भ्रष्टाचारियों को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है?
राशन कार्ड की पात्रता पर बड़ा सवाल, 70% अपात्र – फिर भी कार्ड चालू
रीवा और मऊगंज जिले में हजारों ऐसे व्यक्ति हैं जिनके नाम पर गरीबी रेखा से नीचे (BPL) कार्ड बने हैं, जबकि वे समृद्ध हैं। वहीं वास्तविक गरीब दर-दर भटक रहे हैं। ₹2,000 से ₹3,000 में कार्ड बनवाए जा रहे हैं। यह पूरा सिस्टम दलालों के इशारे पर चलता है।
बाजार में बिक रहा मुफ्त का अनाज – खुलेआम बिचौलियों की खरीद
उचित मूल्य की दुकान के पास बैठे एजेंट 18 से 20 रुपए किलो की दर से गेहूं व चावल खरीदते हैं, जिसे बाद में ऊंचे दामों में बेचा जाता है। हितग्राही पैसों के लालच में मुफ्त राशन बेच देते हैं। सवाल उठता है कि क्या इन सब गतिविधियों से खाद्य विभाग पूरी तरह अनजान है या जान-बूझकर आंख मूंदे हुए है?
प्रशासन की चुप्पी – जांच कब और कौन करेगा?
यह सब तब हो रहा है जब शासन और खाद्य विभाग के पास टेक्नोलॉजी, पोर्टल और निगरानी के सभी संसाधन मौजूद हैं। फिर भी कार्रवाई न होना गंभीर संदेह उत्पन्न करता है। क्या जिला कलेक्टर रीवा और मऊगंज इस ओर ध्यान देंगे? क्या गोदाम से निकलने वाली बोरियों का वास्तविक वजन रिकॉर्ड किया जा रहा है? क्या तुला यंत्रों की जांच हो रही है?
जनता की मांग:
1. सभी राशन दुकानों का स्वतंत्र ऑडिट किया जाए।
2. गोदाम से बोरियों के वजन की जांच हो और रिकॉर्ड सार्वजनिक हो।
3. हितग्राहियों की पुनः पात्रता जांच कर अपात्रों के कार्ड रद्द किए जाएं।
4. बिचौलियों और विक्रेताओं की मिलीभगत पर कानूनी कार्रवाई हो।
5. भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों की जिम्मेदारी तय कर सस्पेंड किया जाए।
यदि अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो जनता को न्याय मिलना संभव नहीं होगा। यह मामला केवल भ्रष्टाचार का नहीं, गरीब की थाली से निवाला छीनने का है।
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