लौरी गढ़ खरीदी केंद्र में चौकीदार की संदिग्ध भूमिका पर उठे सवाल, जनचर्चा से उठी जांच की मांग — प्रशासन अब तक मौन
रीवा जिले के लौरी गढ़ स्थित खरीदी केंद्र में कार्यरत चौकीदार राम गणेश द्विवेदी इन दिनों जनचर्चा का विषय बने हुए हैं। स्थानीय स्तर पर, सोशल मीडिया से लेकर यूट्यूब चैनलों तक चौकीदार की कार्यप्रणाली, आय–व्यय असंतुलन, संपत्ति विस्तार और पद से परे गतिविधियों को लेकर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं।
हालांकि अब तक इन बातों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जो सूचनाएं सामने आ रही हैं, वे प्रशासन और सहकारिता विभाग के लिए चिंता का विषय बनती जा रही हैं।
मोबाइल कॉल डिटेल्स से खुल सकते हैं बड़े राज?
सूत्रों की मानें तो यदि राम गणेश द्विवेदी की मोबाइल कॉल डिटेल्स की जांच कराई जाए तो कई अनाज व्यापारी, गोदाम प्रभारी और ट्रांसपोर्ट एजेंसियों से उनकी दिनभर की बातचीत का खुलासा हो सकता है। यह आशंका जताई जा रही है कि वे खरीदी केंद्र के नाम पर निजी सांठगांठ से फायदा पहुंचा रहे हैं।
खराब अनाज की ‘सेटिंग’ और जांच की कमी
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी गरम है कि खराब गुणवत्ता वाली धान (लगभग 30 किलो प्रति बोरी) को कथित "सेटिंग" के जरिए गोदाम में जमा कराया गया, लेकिन उस पर अब तक कोई जांच नहीं हुई। प्रश्न यह है कि यदि केंद्र का एक चौकीदार ऐसा कर रहा है तो क्या यह एक व्यापक तंत्र का हिस्सा है?
चौकीदार या ‘सर्वेक्षक’? – पद की मर्यादा से बाहर की गतिविधियां
राम गणेश द्विवेदी केवल चौकीदारी तक सीमित नहीं हैं। जानकारी के अनुसार वे अनाज वितरण, ट्रैक्टर नंबर लगाने, गुणवत्ता जांच जैसे कार्यों में भी सक्रिय रहते हैं — जबकि यह सब उनके पद की सीमा से बाहर है। स्थानीय सूत्र बताते हैं कि वे समय-समय पर समिति द्वारा "सम्मानित" भी किए जाते रहे हैं, जिससे उनकी भूमिका पर और संदेह गहराता है।
मामूली वेतन, लेकिन आलीशान जीवनशैली – उठते हैं कई सवाल
सिर्फ ₹3000 से 4000 रुपए मानदेय प्राप्त होता है। जो कि प्रतिदिन का 100 रुपए पड़ता है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि वे महंगे मोबाइल, मोटरसाइकिल से आवागमन, नगद में खरीदारी, और प्राइवेट स्कूल में बच्चों की पढ़ाई जैसे जीवन स्तर जी रहे हैं।
यह भी आरोप है कि वे गरीबी रेखा (BPL) कार्डधारी होने के बावजूद सरकार की मुफ्त योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं, जबकि वास्तविकता इससे उलट है।
10 वर्षों में करोड़ों की संपत्ति, पर कोई जांच नहीं
स्थानीय जनों का कहना है कि पिछले एक दशक में राम गणेश ने लाखों-करोड़ों की चल-अचल संपत्ति एकत्र की है। फिर भी आज तक न उनके आर्थिक स्रोतों की जांच हुई, न ही आय-व्यय के असंतुलन पर कोई प्रशासनिक रुचि दिखाई गई।
पूर्व में उनके कार्यकाल के दौरान खरीदी केंद्र में हुई चोरी की घटनाएं भी जांच के अभाव में ठंडे बस्ते में पड़ी हैं।
एक व्यक्ति का मामला नहीं, व्यापक समस्या का संकेत
रीवा जिले के अधिकांश खरीदी केंद्रों में इसी तरह की व्यवस्थाएं सक्रिय हैं। जहां चौकीदार और अन्य स्टाफ बिचौलियों के साथ मिलकर किसानों और शासन की योजनाओं के बीच एक ‘वसूली तंत्र’ खड़ा कर चुके हैं।
यदि ऐसे लोगों की निष्पक्ष जांच न की गई तो खाद्य आपूर्ति और सार्वजनिक वितरण प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े हो जाएंगे।
अब सवाल यह है – क्या जागेगा प्रशासन?
क्या जिला कलेक्टर और संभागीय आयुक्त इस मामले में स्वतः संज्ञान लेकर निष्पक्ष जांच कराएंगे? या यह भी रीवा जिले की उन अनेक फाइलों में सिमट जाएगा जिनका कभी निस्तारण नहीं हुआ?
यह समाचार जनसूत्रों, यूट्यूब चैनलों और स्थानीय नागरिकों की चर्चाओं पर आधारित है। प्रशासनिक पुष्टि के बाद स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।


