ग्राम स्वराज के सपनों पर भ्रष्टाचार का ग्रहण: मध्य प्रदेश के पंचायतों में योजनाएं बनीं ‘कमीशन योजना’, जनता बनी तमाशबीन
विशेष रिपोर्ट | Vindhya Vasundhara Samacharरीवा मऊगंज:
क्या महात्मा गांधी का ग्राम स्वराज – जहां ग्रामीण अपने निर्णय स्वयं लें, योजनाएं स्थानीय जरूरतों के अनुरूप बनें और क्रियान्वयन पारदर्शिता के साथ हो – आज केवल पुस्तकों और भाषणों तक सीमित रह गया है? मध्य प्रदेश के रीवा, जिले की जनपद पंचायत , गंगेव, त्यौंथर, सिरमौर, और मऊगंज जिले की जनपद पंचायत हनुमाना, नईगढ़ी, मऊगंज जैसे जनपदों में योजनाएं कागज़ों पर पूरी होती दिख रही हैं, पर जमीन पर हालात चिंताजनक और भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा को पार कर चुके हैं।
नमामि गंगे: जल संरक्षण नहीं, भ्रष्टाचार संरक्षण योजना
पिछले वित्त वर्ष में ‘नमामि गंगे’ योजना के अंतर्गत दर्जनों पंचायतों में तालाब, चेक डैम, नाला गहरीकरण जैसे कार्य स्वीकृत हुए। लेकिन गढ़ अगड़ाल, बाबूपुर, डगरदुआ, हिनौती, हीरूडीह, लोरी, लोटनी, मदरी, पड़ुआ, रक्सा माजन जैसी पंचायतों में जिन कार्यों की सरकारी अभिलेखों में ‘समाप्त’ स्थिति दर्शाई गई है, वहां ज़मीन पर न तो कोई निर्माण है, न कोई जल संरक्षण का चिह्न।
उदाहरण के तौर पर अगड़ाल पंचायत में 12 चेक डैम स्वीकृत थे, लेकिन ग्रामीणों के अनुसार एक भी पूरी तरह निर्मित नहीं हुआ। इसी तरह हनुमान नाला (रक्सा मांजन ) और हररही नाला ( गढ़ लोरी, डगरदुआ) में कार्य केवल नाम के लिए हुआ।
‘कमीशन पहले, निर्माण बाद में’ – पंचायतों का मौन सत्य
जांच से यह भी सामने आया है कि पंचायत प्रतिनिधियों को योजना राशि का 50% तक ‘बांटना’ पड़ता है – जिसमें सचिव, रोजगार सहायक, तकनीकी सहायक, जनपद और जिला स्तर तक के अधिकारी शामिल होते हैं। 25% भुगतान के बाद ही राशि जारी होती है। कार्यों की स्वीकृति, माप और मूल्यांकन एक सुनियोजित कमीशन चक्र में फंस चुके हैं।
एक सरपंच की पीड़ा: “हम चाहते हैं काम हो, लेकिन जब आधी राशि ऊपर चली जाती है, तो काम कैसे कराएं? सब जानते हैं, लेकिन नाम कोई नहीं लेता – डर से।” जबकि कार्य मशीन द्वारा कराए जाते हैं लेकिन राशि मास्टर रोल द्वारा की जाती है।
स्वच्छता केवल घोषणाओं में
सरकारी दस्तावेजों के अनुसार मऊगंज और रीवा ‘समग्र स्वच्छ’ घोषित हो चुके हैं। लेकिन धरातल पर खुले में शौच, गंदगी के ढेर, जर्जर और अनुपयोगी शौचालय साफ दिखाते हैं कि करोड़ों की स्वच्छता योजना सिर्फ आंकड़ों में सफल रही। सार्वजनिक स्थानों की स्थिति साफ बयान कर रही है कि ‘स्वच्छता केवल घोषणा’ बनकर रह गई है।
जनता की आंख में धूल, अधिकारियों की चुप्पी क्यों?
यदि कार्य सही हैं तो मूल्यांकन क्यों नहीं? यदि योजनाएं पूरी हुईं, तो ग्रामीणों को उसका लाभ क्यों नहीं? यदि सबकुछ पारदर्शी है, तो सार्वजनिक जांच से डर कैसा?
सरकार द्वारा हर वर्ष जारी होने वाली योजनाएं, उनके लिए आने वाला करोड़ों रुपयों का बजट और उसे निगरानी करने वाली व्यवस्था तब तक बेमानी है, जब तक ग्राम स्तर पर कार्यों का सामाजिक ऑडिट अनिवार्य नहीं किया जाता।
मांग: न्यायिक जांच हो, जिम्मेदार हों दंडित
इस पूरे प्रकरण में मांग की जा रही है कि रीवा, मऊगंज और संबंधित जनपदों में राज्य शासन द्वारा स्वतंत्र और न्यायिक जांच कराई जाए, जिसमें केवल सरपंचों को नहीं, बल्कि योजना स्वीकृति देने वाले अधिकारियों और मूल्यांकन करने वाले तकनीकी स्टाफ को भी कठघरे में लाया जाए।
यदि इस भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगाई गई, तो ग्राम स्वराज केवल एक सपना बनकर रह जाएगा, और जनता का भरोसा पंचायती राज प्रणाली से उठ जाएगा।




