पानी के लिए संघर्ष की कगार पर गांव: मनगवां विधानसभा क्षेत्र में जल संकट गहराया, योजनाएं बनी सिर्फ दिखावा
रीवा जिले के अंतर्गत आने वाले मनगवा विधानसभा क्षेत्र में जल संकट विकराल रूप लेता जा रहा है। हालात इतने भयावह हो गए हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में पानी के लिए महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों को दिनभर भटकना पड़ रहा है। गढ़ ग्राम पंचायत, जो इस क्षेत्र की तीसरी सबसे बड़ी पंचायत मानी जाती है, वहां हालात सबसे चिंताजनक हैं। गांव के तालाब सूख चुके हैं, बोरवेल दम तोड़ चुके हैं और नलजल योजनाएं केवल कागजों पर जीवित हैं।
जल जीवन मिशन: 18,000 करोड़ की योजना, लेकिन धरातल पर सूनापन
मध्यप्रदेश सरकार द्वारा जल जीवन मिशन के तहत रीवा और मऊगंज जिलों में लगभग 18,000 करोड़ रुपये की योजनाएं संचालित की जा रही हैं। इसमें अकेले रीवा जिले में 12,000 करोड़ रुपये की परियोजनाएं प्रस्तावित हैं। इनका उद्देश्य हर घर तक शुद्ध जल पहुंचाना है, लेकिन इनका लाभ न ग्रामीणों को मिल रहा है और न ही कस्बों में कोई सुधार दिख रहा है।
लोगों का आरोप है कि ये योजनाएं केवल कुछ ठेकेदारों, सप्लायर कंपनियों और चुनिंदा अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों के लाभ तक सीमित रह गई हैं। गांवों में न पाइपलाइन से पानी पहुंच रहा है, न बोरवेल चालू हैं और न ही जलस्त्रोत बचे हैं।
ग्राम पंचायत गढ़: पानी के लिए जातीय टकराव की आहट
मनगवा क्षेत्र की गढ़ पंचायत में स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि पानी को लेकर सामाजिक तनाव और जातीय संघर्ष की स्थिति बन गई है। ग्रामीणों का कहना है कि जिन समुदायों की जनसंख्या अधिक है, वे अपने प्रभाव से पानी पर कब्जा कर रहे हैं, जबकि कमजोर वर्ग और छोटे समूह पानी के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं। यह असंतुलन आने वाले दिनों में बड़े सामाजिक टकराव को जन्म दे सकता है।
प्रशासनिक प्रयास अधूरे, आदेशों की उड़ रही धज्जियां
रीवा कलेक्टर प्रतिभा पाल जल संकट को गंभीरता से लेते हुए लगातार अधिकारियों को निर्देश दे रही हैं, लेकिन ये निर्देश ज़मीनी स्तर पर कागजों से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। पंचायतों से लेकर नगर परिषद और नगर निगम तक की स्थानीय प्रशासनिक इकाइयां जल संकट से निपटने में पूरी तरह असफल साबित हो रही हैं।
जनप्रतिनिधि मौन, जनता त्रस्त
जब विंध्य वसुंधरा समाचार ने इस संकट पर सरपंच, जनपद सदस्य, विधायक और सांसद से प्रतिक्रिया लेने का प्रयास किया, तो किसी ने स्पष्ट जवाब नहीं दिया। आमजन का आरोप है कि ये प्रतिनिधि केवल चुनाव के समय दिखाई देते हैं और बाद में जनता की तकलीफों से मुंह मोड़ लेते हैं। अधिकारी भी इन्हीं जनप्रतिनिधियों की सेवा में व्यस्त रहते हैं, जबकि आमजन पानी के लिए सड़क पर संघर्ष कर रहा है।
जल जीवन मिशन बनता जा रहा है केवल एक मिशन, जीवन हो रहा है जलविहीन
यदि अब भी प्रशासन, जनप्रतिनिधि और सामाजिक संगठन नहीं जागे तो आने वाले समय में जल संकट केवल एक 'सामाजिक चुनौती' नहीं, बल्कि 'संविधानिक और मानवीय आपदा' बन जाएगा। आवश्यकता है ईमानदारी से योजनाओं के क्रियान्वयन की, पारदर्शिता की और समुदाय स्तर पर जल संरक्षण के प्रयासों की।
अन्यथा, यह जल संकट ‘जल क्रांति’ की ओर नहीं, जल विनाश की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है।

