रीवा-मऊगंज से पूरे प्रदेश तक फैला 'पोस्टिंग सिंडिकेट' — निष्ठावान अफसर दरकिनार, रसूखदारों की सिफारिश पर भ्रष्टाचार को शिष्टाचार का दर्जा!
विशेष रिपोर्ट | विंध्य वसुंधरा समाचार | रीवा-मऊगंज मध्यप्रदेश
रीवा/मऊगंज — मध्य प्रदेश के रीवा-मऊगंज जिले से उठती यह सच्चाई अब पूरे प्रदेश की शासन प्रणाली को आईना दिखा रही है — प्रशासनिक तंत्र में निष्ठा, कर्तव्यपरायणता और ईमानदारी अब बेमानी होती जा रही है, जबकि ‘ठेकेदारी-राजनीति-संरक्षण’ की तिकड़ी ही अधिकारियों की पोस्टिंग का असली मापदंड बन गई है।
अब यह आम धारणा बन गई है कि जो अफसर नेता-ठेकेदारों का ‘करीबी’ है, वही जिले के मलाईदार पदों पर तैनात रहेगा, और जो अफसर अपने काम में ईमानदार है, वह ट्रांसफर की धूल फांकता रहेगा। यह स्थिति न केवल रीवा और मऊगंज तक सीमित है, बल्कि पूरे प्रदेश में प्रशासनिक भ्रष्टाचार की जड़ें गहराई तक फैल चुकी हैं।
ईमानदार अफसर बन रहे शिकार, ‘कुंडली मारे बैठे हैं भ्रष्टाचार के अजगर’
रीवा-मऊगंज जिले के शायद ही कोई विभाग ऐसा बचा हो जहां भ्रष्ट लॉबी की मजबूत पकड़ न हो। प्रशासन, पुलिस, स्वास्थ्य,सहकारिता, महिला बल विकास , पंचायतीराज खाद्य विभाग, कृष , राजस्व, शिक्षा, खनिज, आवास – हर विभाग में पदस्थ अफसरों की नियुक्ति ‘कर्म' नहीं, ‘कनेक्शन' के आधार पर की जा रही है।
ईमानदार और निष्ठावान अफसर यदि नियमों के तहत कार्रवाई करते हैं, तो उन्हें बदले में बार-बार ट्रांसफर, मानसिक प्रताड़ना और राजनीतिक उपेक्षा का सामना करना पड़ता है। विगत कुछ वर्षों में ऐसे कई पुलिसकर्मियों, पटवारियों, डॉक्टरों और अन्य अधिकारियों को सजा के तौर पर दूरदराज क्षेत्रों में भेजा गया, जिनका एकमात्र ‘अपराध’ था – अपने कर्तव्य के प्रति ईमानदारी।
गृह और स्वास्थ्य मंत्रालय पर उठते सवाल — मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री की प्रतिष्ठा दांव पर
यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब देखा जाए कि गृह मंत्रालय स्वयं मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के पास है, और स्वास्थ्य विभाग उपमुख्यमंत्री एवं रीवा विधायक श्री राजेन्द्र शुक्ल के अधीन है। लेकिन इन दोनों विभागों में आए दिन सामने आ रहे गंभीर मामले कहीं न कहीं नेतृत्व की जवाबदेही पर भी प्रश्नचिन्ह खड़े कर रहे हैं।
नशीली कफ सिरप, अवैध गोलियों और प्रतिबंधित दवाओं की तस्करी में पुलिस की मिलीभगत के आरोप लग रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, कई थानों में ऐसे अधिकारी तैनात हैं जो तस्करों के संपर्क में हैं और जानबूझकर कार्रवाई नहीं करते। वहीं, जो पुलिसकर्मी सचेत होकर इस अवैध नेटवर्क पर चोट करना चाहते हैं, उन्हें 'राजनीतिक दिशा-निर्देशों' के तहत पीछे हटा दिया जाता है।
ठेकेदारी लॉबी का कब्ज़ा — हर कुर्सी पर ‘सिफारिश’ की मोहर
अभी जिस तरीके से सरकारी विभागों में संविदा नियुक्तियां, आउटसोर्सिंग, एनजीओ संचालन और ठेकेदारी व्यवस्थाएं चल रही हैं, वहां केवल वही टिक सकता है, जो किसी माननीय या ठेकेदार के पाले में खड़ा हो।
हर नियुक्ति में यह देखा जाता है कि उम्मीदवार का 'राजनीतिक गॉडफादर' कौन है। कई स्थानों पर तो यह भी सामने आया कि स्कूलों, अस्पतालों, आंगनबाड़ी, स्वास्थ्य केंद्रों में कार्यरत कर्मचारी किसी मंत्री या प्रभावशाली नेता के 'पारिवारिक' संबंधों से जुड़े हुए हैं, योग्यता गौण हो चुकी है।
जनता का सवाल — 230 विधानसभा क्षेत्रों के क्या अपने-अपने गृह मंत्री हैं?
जब प्रदेश में गृह मंत्रालय मुख्यमंत्री के अधीन है, तो फिर हर विधानसभा क्षेत्र में क्या अलग-अलग ‘छाया गृह मंत्री’ नियुक्त हो चुके हैं? यदि थानों की तैनाती, कार्रवाई, केस दर्ज करना और हटाना भी स्थानीय विधायकों और उनके प्रतिनिधियों की सिफारिश से तय होगा, तो अपराध नियंत्रण किसकी जिम्मेदारी होगी?
जनता अब यह जानना चाहती है कि जब किसी विधानसभा क्षेत्र में अपराध होता है, तो क्या उसके लिए जिम्मेदार केवल पुलिस अधिकारी है या फिर उस क्षेत्र के निर्वाचित जनप्रतिनिधि भी जवाबदेह हैं?
मुख्यमंत्री से अपेक्षा — ईमानदार अफसरों को बनाइए ढाल, न कि निशाना
यह वह समय है जब मुख्यमंत्री को इस पूरे सिस्टम की री-एसेसमेंट करनी चाहिए। ईमानदार अधिकारियों की गोपनीय सूची तैयार कर उन्हें संरक्षण दिया जाए, न कि लगातार उन्हें कुर्बान किया जाए।
यदि प्रदेश में न्याय, पारदर्शिता और प्रशासनिक गरिमा बचानी है, तो पोस्टिंग-पदस्थापना के इस भ्रष्टाचार तंत्र को तोड़ना होगा — और यह काम केवल आदेश से नहीं, राजनीतिक इच्छाशक्ति से होगा।


