रीवा-मऊगंज में जनसमस्याओं पर मौन क्यों हैं बड़े प्रिंट मीडिया संस्थान?
विंध्य वसुंधरा विशेष रिपोर्ट | रीवा-मऊगंज मध्यप्रदेश
समाचार पत्रों को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया है। इनका दायित्व है – सच को सामने लाना, शासन-प्रशासन को जिम्मेदार ठहराना और आमजन की समस्याओं को मंच देना। लेकिन आज रीवा और मऊगंज जिले में जनता के बीच एक मौन और असहज सवाल गूंज रहा है –
"क्या अखबार आज भी जनता की आवाज़ हैं या फिर केवल सत्ता, सिस्टम और विज्ञापनों की गोद में बैठ गए हैं?"
📌 सड़क पर मरती गौमाता, मीडिया खामोश
रीवा जिले में बीते कुछ महीनों में गौमाता की सड़क दुर्घटनाओं में हो रही मौतें भयावह रूप ले चुकी हैं। कलवारी ब्रिज, भदवल चौराहा, मऊगंज हाईवे, सिरमौर रोड – हर तरफ बेजुबान पशु रेत के ढेर की तरह कुचले जा रहे हैं। प्रशासन मौन, और मीडिया? वह भी खामोश।
कई बार गौसेवकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों ने इन घटनाओं पर ध्यान दिलाया, लेकिन बड़े अखबारों में एक भी प्रभावशाली कॉलम नहीं।
📌 नशीली कफ सिरप की साजिश: दिखावे की कार्रवाई, असली मास्टरमाइंड अछूते
गांव-गांव, खासकर स्कूल और कॉलेज के छात्रों में नशीली कफ सिरप की लत बढ़ रही है। सूत्र बताते हैं कि रीवा-मऊगंज में कुछ थोक व्यापारी बड़े पैमाने पर इसका नेटवर्क संचालित कर रहे हैं, लेकिन कार्रवाई केवल फुटकर दुकानदारों तक सीमित है।
गांव गांव में अवैध दारू की पेकारी की जा रही किंतु धन्य है मीडिया 10 पांव 20 पांव जब शराब पकड़ी जाती है तो समाचार पीठ थपथपाने का काम करने लगती है। जब की यह खुलासा नहीं होता कि आखिर यह दारू किस दुकान से आई है।
वहीं अगर देखा जाय कि समाचार पत्रों में अधिकाश विज्ञापन स्वस्थ संबंधित डॉक्टरों के प्रकाशित होते रहते है। जब कोई स्वस्थ संबंधित घटना होती है तो यही समाचार पत्रों में जनता की आवाज दबा दी जाती है। कारण यही है सिर्फ विज्ञापन
प्रशासन पीठ थपथपाता है और मीडिया उस “थप्पथपाहट” को पहले पन्ने पर छाप देता है, जबकि इस पूरे नशे के रैकेट के पीछे बैठे लोग अब भी खुलेआम घूम रहे हैं।
📌 अवैध खनन माफिया: गांव उजड़ते रहे, खबरें गुम होती रहीं
रीवा जिले के ग्रामीण अंचलों में मिट्टी, मोरम और पत्थर की अवैध खुदाई का अंधाधुंध खेल जारी है। आदिवासी और गरीब किसानों की जमीनें खोखली की जा रही हैं। लेकिन इन पर न तो छापा पड़ता है, न ही अखबारों में कोई खोजी रिपोर्ट आती है।
क्या पत्रकारिता का धर्म सिर्फ विज्ञापनदाताओं को संतुष्ट करना रह गया है?
📌 आंगनबाड़ी में ताले, थानों में जंगलराज – फिर भी रिपोर्टर चुप क्यों?
जमीनी हकीकत यह है कि कई गांवों में आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों को पोषण नहीं, बल्कि ताले मिलते हैं। वहीं कई थानों में न्याय व्यवस्था के नाम पर ‘पावर गेम’ चलता है। लेकिन प्रिंट मीडिया इन संस्थानों के अव्यवस्था पर कभी खोजी रिपोर्टिंग करता नहीं दिखता।
📌 वृक्षारोपण की 'ग्रीन धोखाधड़ी': हर साल दिखावे का Plantation Festival
सरकारी दफ्तरों में हर वर्ष लाखों पौधे रोपने का दावा होता है। पर क्या अखबारों ने कभी पूछा कि अगले साल कितने बचे? कितने जीवित हैं? कहां रिपोर्ट है? नहीं। अखबारों की हेडलाइन होती है – “फलां मंत्री ने लगाया पीपल का पौधा”।
❓ जनता से सवाल: अब समय आ गया है विचार करने का...
1. जो अखबार आपकी ज़मीनी समस्याएं नहीं उठाते, क्या वे वास्तव में जनता के प्रतिनिधि हैं?
2. क्या रीवा-मऊगंज के प्रमुख प्रिंट मीडिया संस्थानों का बहिष्कार नहीं होना चाहिए जो केवल सत्ता, प्रशासन और विज्ञापनदाताओं की भाषा बोलते हैं?
3. क्या आप उस मीडिया को समर्थन देंगे जो गांव की आंगनबाड़ी, थानों, गौशालाओं और सड़कों की हकीकत दिखाता है?
4. क्या पत्रकारिता अब ‘प्रेस विज्ञप्ति छापने’ तक सिमट कर रह गई है?
✊ जनता की ताकत से ही सच्ची पत्रकारिता बचेगी
समाचार पत्र कभी सिर्फ "पढ़ने की चीज़" नहीं थी। वे जनआंदोलन की चिंगारी होते थे। लेकिन आज अगर वे जनसरोकारों से मुंह मोड़ते हैं तो अब जनता को ही निर्णय लेना होगा
"जो मेरी आवाज़ नहीं उठाता, वह मेरे घर क्यों आए?"
यदि मीडिया बिक गया है, तो जनता को खरीददार नहीं बनना चाहिए।
सत्ता के पिछलग्गू अखबारों को छोड़ें, और सजग जनमाध्यमों को समर्थन दें।


