रीवा-मऊगंज में मनीराम मॉडल का 'मदिरा तंत्र': जिला आबकारी विभाग की चुप्पी, शराब माफिया की चांदी
विंध्य वसुंधरा समाचार की विशेष रिपोर्ट | रीवा/मऊगंज। मध्यप्रदेश
रीवा संभाग में शराब माफिया इतने मजबूत हो चुके हैं कि अब उन्होंने प्रशासन को ही अपने जाल में उलझा लिया है। क्षेत्रीय जनता त्रस्त है, युवा पीढ़ी बर्बाद हो रही है और ग्राम पंचायतों से लेकर शहरी बस्तियों तक हर नुक्कड़ पर अवैध शराब की दुकानें फल-फूल रही हैं।
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| (रीवा जिले की गढ़ कंपोजिट शराब दुकान की अवैध पेंकारी ले जाते हुए ) |
लेकिन सबसे गंभीर और शर्मनाक पहलू यह है कि इन सबके बीच जिला आबकारी विभाग और विशेष रूप से जिला आबकारी अधिकारी पूरी तरह से निष्क्रिय और मौनदर्शक बने हुए हैं। सवाल यह उठता है—क्या यह चुप्पी किसी भय का परिणाम है या किसी 'हफ्ता तंत्र' की मौन सहमति?
अवैध शराब का साम्राज्य: जहां कानून की नहीं, मनीराम की चलती है
स्थानीय कारोबारियों और सूत्रों के अनुसार, मनीराम नामक व्यक्ति प्रशासनिक एवं पुलिस तंत्र में इतनी पकड़ रखता है कि अवैध शराब का संचालन अब ‘मॉडल सिस्टम’ की तरह कार्य करता है। दुकानदारों का दावा है कि—
हम हर महीने लाखों रुपये सेवा शुल्क के नाम पर मनीराम को देते हैं, वहीं पुलिस-आबकारी विभाग को मुफ्त दारू और कमीशन दिया जाता है। अगर ये भुगतान बंद करें, तो हमारी दुकान अगले दिन बंद हो जाएगी।"
क्या यह स्वीकार कर लेने लायक स्थिति है?
दावा या धंधा? जिला आबकारी अधिकारी की चुप्पी कई सवाल छोड़ती है
आबकारी विभाग का मूल कार्य है—शराब की वैध बिक्री पर नियंत्रण और अवैध बिक्री पर रोक। लेकिन वर्तमान में यह विभाग खुद अवैध व्यापार के लिए ढाल बन चुका है।
आज यदि रीवा और मऊगंज के किसी भी गांव में जाकर देखा जाए, तो कम से कम 4-5 अवैध शराब दुकानें और 10 से अधिक नशे के अड्डे मिल जाएंगे।
तो फिर सवाल है—जिला आबकारी अधिकारी महोदय कहां हैं? क्या वे इस जिले में केवल वेतन लेने के लिए पदस्थ हैं? या फिर इन अवैध दुकानों से 'हफ्ता वसूली' का हिस्सा तय हो चुका है?
आईजी स्तर की कार्रवाई भी रह गई 'कागज़ी सर्जरी'
पिछले दिनों संभागीय आईजी गौरव राजपूत के नेतृत्व में अवैध शराब पर सघन कार्रवाई की गई। कई थानों में एक साथ छापे मारे गए, दर्जनों प्रकरण दर्ज हुए, परन्तु जप्ती अधिकतर 10 पाव, 20 पाव तक सीमित रही।
इन कार्यवाहियों में ना कोई बड़ा सप्लायर पकड़ा गया, ना कोई संरक्षक अधिकारी बेनकाब हुआ।
यह सिद्ध करता है कि पूरी व्यवस्था ऊपर से नीचे तक 'सेटिंग तंत्र' से चल रही है।
ग्राम पंचायतों को किया जाए जवाबदेह, सरपंच बनें निगरानीकर्ता
प्रशासन को यह समझना होगा कि गांवों में पंचायत स्तर पर ही नियंत्रण की शुरुआत करनी होगी।
प्रत्येक पंचायत में एक निगरानी समिति गठित हो, जिसमें सरपंच, सामाजिक कार्यकर्ता, महिला स्व-सहायता समूह और युवाओं को शामिल किया जाए।
इन समितियों को यह अधिकार दिया जाए कि वे अवैध शराब, नशे और हफ्ता वसूली की रिपोर्ट कलेक्टर, एसपी और आईजी स्तर तक सीधे भेज सकें।
जनता पूछ रही है: क्या जिला आबकारी अधिकारी को संरक्षण प्राप्त है?
रीवा की जनता का यह सीधा और स्पष्ट सवाल है:
क्या जिला आबकारी अधिकारी को स्थानीय माफियाओं से आर्थिक लाभ प्राप्त हो रहा है?
यदि नहीं, तो फिर क्या कारण है कि एक भी बड़े अवैध संचालक के खिलाफ अब तक NDPS एक्ट या IPC की सख्त धाराओं में कार्यवाही नहीं हुई?
कितनी बार अधिकारी ने खुद फील्ड में जाकर अवैध दुकानों पर छापे मारे हैं?
विभागीय गोपनीय रिपोर्टें क्यों दबा दी जाती हैं?
पत्रकारिता का कर्तव्य: जवाब दो, जवाब लो
"जिला आबकारी अधिकारी रीवा—क्या आप इस जिले में वाकई कार्यरत हैं या मनीराम के मदिरा मॉडल के सह-प्रबंधक बन चुके हैं?"
यदि आप में नैतिक उत्तरदायित्व है, तो सार्वजनिक रूप से इस जिले में संचालित अवैध शराब के अड्डों की सूची, कार्रवाई की रिपोर्ट और आगे की रणनीति को उजागर करें।
यदि नहीं, तो कलेक्टर महोदय से अपील है कि वे इस अधिकारी को तत्काल पदमुक्त कर, उच्चस्तरीय जांच कराएं।
आखिर में जनता की चेतावनी: अब 'दारू राज' नहीं सहेंगे
रीवा और मऊगंज की जनता अब चुप नहीं बैठेगी। यदि शासन-प्रशासन ने अब भी आंखें मूंदी रखीं, तो जल्द ही जिले में जनांदोलन की लहर उठेगी, और यह आंदोलन मनीराम मॉडल के साथ-साथ उन अफसरों को भी बहा ले जाएगा जो अपनी जिम्मेदारियों से भाग रहे हैं।
🛑 महत्वपूर्ण सूचना
विंध्य वसुंधरा समाचार इस समाचार में प्रकाशित तथ्यों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं करता है। यह रिपोर्ट स्थानीय जनसूचनाओं, क्षेत्रीय सूत्रों, सामाजिक प्रतिनिधियों और प्रशासनिक गतिविधियों के आधार पर तैयार की गई है।
प्रकाशित सामग्री केवल जनहित में उठाए गए गंभीर मुद्दों पर ध्यान आकर्षित करने का प्रयास है। इसकी पूर्ण सत्यता प्रशासनिक जांच एवं विभागीय कार्यवाही के पश्चात ही स्पष्ट रूप से सामने आ सकेगी।




