रीवा कलेक्टर के आदेश की उड़ रही धज्जियाँ: रीवा मऊगंज में खुलेआम बिक रही शराब एमआरपी से ज्यादा रेट पर, रेट लिस्ट गायब
आबकारी विभाग की मिलीभगत से फलफूल रहा अवैध शराब व्यापार, ग्रामीण अंचलों में धड़ल्ले से चल रही पैकारी
विंध्य वसुंधरा समाचार की विशेष रिपोर्ट | रीवा/मऊगंज
रीवा और मऊगंज जिले , आसपास के क्षेत्रों में सरकारी शराब दुकानों पर नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ रही हैं।रीवा कलेक्टर प्रतिभा पाल द्वारा स्पष्ट निर्देश दिए जाने के बावजूद न तो दुकानों पर रेट लिस्ट चस्पा की गई है, न ही ग्राहकों को एमआरपी पर शराब मिल रही है। शराब की बोतल पर छपा मूल्य महज दिखावा बन गया है। दुकानदार धड़ल्ले से 10 से 30 रुपये प्रति बोतल अधिक वसूल कर रहे हैं, और सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह सब कुछ जिम्मेदार विभागों की नाक के नीचे, उनकी सहमति से चल रहा है।
कलेक्टर के आदेश को आबकारी विभाग ने बना दिया मजाक
पिछले दिनों रीवा जिला कलेक्टर ने स्पष्ट निर्देश जारी किए थे कि
हर शराब दुकान पर रेट लिस्ट स्पष्ट रूप से प्रदर्शित की जाए।
ग्राहक से प्रिंट रेट से अधिक पैसा न लिया जाए।
उल्लंघन की स्थिति में लाइसेंस निलंबन व निरस्तीकरण की कार्रवाई की जाएगी।
लेकिन मऊगंज जिले के आसपास , नईगढ़ी, त्योंथर, देवतालाब शाहपुर हनुमाना मानिकवार एवं रीवा जिले के रायपुर कर्चुलियान मनगवा गंगेव गढ़ कटरा सोहागी सिरमौर लालगांव बैकुंठपुर सहित पूरे अंचल की हकीकत यह है कि कलेक्टर के आदेश को न कोई सुन रहा है, न कोई मान रहा है। शराब दुकानों पर न रेट लिस्ट है, न बिल, न निगरानी। आबकारी अधिकारी मौन दर्शक हैं और शिकायतों के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जाती।
पैसे और प्रभाव के आगे प्रशासन भी मौन, खुलेआम हो रही लूट
ग्रामीण अंचलों में स्थिति और भी भयावह है। दुकानों से शराब निकलकर गांव-गांव पहुंचाई जा रही है, जहां अवैध ‘पैकारियों’ के माध्यम से मनमाने दामों पर बेची जा रही है। यह न सिर्फ सरकारी राजस्व की चोरी है, बल्कि शासन की छवि पर भी करारी चोट है।
नईगढ़ी मुख्य मार्ग पर शाम होते ही शराबियों की भीड़ और सड़क के दोनों ओर खड़े वाहन यातायात को बाधित कर रहे हैं। जाम, दुर्घटनाएं और सार्वजनिक अव्यवस्था यहां रोजमर्रा की बात हो चुकी है।
समाजसेवी संस्थाओं ने इस पर कई बार विरोध किया, ज्ञापन दिए, लेकिन ठेकेदारों की “ऊपर” तक पहुंच और “नीचे” तक मिलीभगत के चलते सबकुछ दबा दिया जाता है।
आखिर क्यों है आबकारी विभाग की चुप्पी? क्या मिलीभगत का है खेल?
कलेक्टर के आदेश को दरकिनार करने की हिम्मत आबकारी अमला क्यों कर पा रहा है? क्या इसका कारण वो कमीशनखोरी है जिसके चलते जिम्मेदार अफसर सिर्फ "कोरमपूर्ति" तक सीमित रह गए हैं? क्या शराब माफियाओं के साथ विभागीय गठजोड़ की वजह से कार्रवाई सिर्फ फाइलों में सिमट कर रह जाती है?
सूत्रों की मानें तो —
कई थानों में शराब ठेकेदारों से “स्थायी हिस्सेदारी” तय है।
आबकारी निरीक्षक व अधिकारी पैकारी की हर गतिविधि से अवगत हैं।
शराब की दुकानों से रात के अंधेरे में अवैध आपूर्ति के लिए वाहन रवाना किए जाते हैं।
ग्रामीण अंचलों में सैकड़ों अवैध बिक्री केंद्र लाइसेंसी दुकानों की आड़ में चलाए जा रहे हैं।
कुल मिलाकर पूरा सिस्टम, ठेकेदारों के आगे बंधक नजर आता है।
कलेक्टर की साख पर भी सवाल: क्या आदेश केवल कागजों तक सीमित रहेंगे?
जब जिले की सबसे बड़ी प्रशासनिक अधिकारी के आदेशों का ऐसा खुलेआम मजाक उड़ाया जाए, तो यह न केवल शासन के प्रति अवमानना है, बल्कि यह एक प्रशासनिक विफलता भी है। अगर रीवा कलेक्टर प्रतिभा पाल द्वारा जारी आदेशों को विभाग नजरअंदाज कर रहा है तो जनता किससे उम्मीद करे?
कलेक्टर को अब केवल आदेश देने से नहीं, सीधे मोर्चा संभालकर दोषियों पर सख्त कार्रवाई करनी होगी। ऐसी सख्ती जिससे अगली बार कोई अधिकारी या ठेकेदार सरकारी निर्देशों को हल्के में न ले।
अब क्या हो अगला कदम?
1. जिले के प्रत्येक शराब दुकान की निरीक्षण रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
2. प्रत्येक दुकान पर सीसीटीवी निगरानी अनिवार्य की जाए।
3. एक विशेष जांच टीम का गठन कर अवैध पैकारी व ओवररेटिंग की जांच हो।
4. जो अधिकारी कार्रवाई से बच रहे हैं, उन पर विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।
यह सिर्फ शराब का मामला नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही की परीक्षा है।
सरकारी नियमों को ताक पर रखकर जनता को लूटा जा रहा है। यह न केवल आर्थिक शोषण है, बल्कि एक सामाजिक जहर भी है जो हमारे गांवों, कस्बों और युवाओं को बर्बादी की ओर ले जा रहा है। और जब यह सब कुछ सरकार के नियमों की आड़ में, सरकारी विभागों की आंखों के सामने हो रहा हो—तो यह पूरे शासन-प्रशासन की साख पर सीधा हमला है।
अब सवाल यह नहीं कि शराब कितने में बिक रही है...
सवाल यह है कि शासन की बात मानने से कौन और क्यों कतरा रहा है


