रीवा में पुलिस तबादलों की नीति ध्वस्त: वर्षों से एक ही स्थान पर जमे अधिकारी, आंतरिक असंतोष और अवैध वसूली पर उठे सवाल
विशेष रिपोर्ट | विंध्य वसुंधरा समाचार | रीवा/मऊगंज/मध्यप्रदेश| 18 जून 2025
प्रदेश शासन द्वारा निर्धारित स्थानांतरण नीति और पारदर्शी प्रशासनिक व्यवस्था की मंशा के बावजूद, रीवा जिले में पुलिसकर्मियों की तैनाती में गंभीर विसंगतियां उजागर हो रही हैं। सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुसार किसी भी अधिकारी/कर्मचारी की पदस्थापना एक ही स्थान पर अधिकतम तीन वर्षों तक ही होनी चाहिए, तथा शिकायत की स्थिति में उसे समयपूर्व हटाया जाना चाहिए। परंतु जमीनी स्तर पर इसके विपरीत स्थिति दिखाई दे रही है।
वर्षों से एक ही स्थान पर पदस्थ अधिकारी, आक्रोश की चिंगारी
रीवा शहर और इसके थाना क्षेत्रों में आरक्षक से लेकर निरीक्षक स्तर तक कई ऐसे पुलिसकर्मी वर्षों से एक ही स्थान पर जमे हुए हैं। लिपिक, वाहन चालक और कार्यालयीन स्टाफ भी अपवाद नहीं हैं। वहीं दूसरी ओर, जिन पुलिसकर्मियों की कोई "पहुंच" नहीं मानी जाती, उन्हें वर्ष में कई बार स्थानांतरित किया जा रहा है। इससे पुलिस विभाग के अंदर ही अंदर गहरी असंतुष्टि और क्षोभ का वातावरण बन रहा है।
सूत्रों का दावा: अवैध कारोबार से जुड़ी करोड़ों की मंथली वसूली
स्थानीय सूत्रों और चर्चाओं के अनुसार, जिले के कुछ प्रमुख थानों में हर माह करोड़ों रुपये की अवैध वसूली की जा रही है। यह कथित वसूली अवैध खनन (गिट्टी-बालू), शराब की पैकारी, सट्टा-जुआ, गांजा, कोरेक्स व ब्राउन शुगर की तस्करी, मेडिकल नशा और पशु तस्करी जैसे अपराधों से होती है। प्रत्येक गतिविधि के लिए ‘थानों में तयशुदा दरें’ होने की बात भी सामने आ रही है।
पशु तस्करी में तो बकरी, भैंस और बैल के लिए अलग-अलग “रेट” निर्धारित बताए जा रहे हैं। यह भी आरोप हैं कि इन अवैध वसूली का पैसा सीधे पुलिस अधिकारियों के पास नहीं जाता, बल्कि गांवों में खड़े बिचौलियों या ऑनलाइन खातों के माध्यम से संग्रह किया जाता है, जिससे जांच पड़ताल से बचा जा सके।
राजनीतिक संरक्षण और चुनिंदा अफसरों की मनमानी पदस्थापना
जिले में कई ऐसे थाना प्रभारी वर्तमान में पदस्थ हैं जिन पर पूर्व में गंभीर आरोप लग चुके हैं — जैसे जुआ-सट्टा संचालित कराना, अवैध कार्यों में संलिप्तता और अपने निजी निवास पर अपराधियों को संरक्षण देना। फिर भी इन पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। माना जा रहा है कि इनकी मजबूत राजनीतिक और प्रशासनिक पकड़ के चलते वे लगातार एक ही क्षेत्र में टिके हुए हैं।
वहीं दूसरी ओर, जिन अधिकारियों पर कोई गंभीर आरोप नहीं हैं, वे बार-बार तबादले का शिकार हो रहे हैं। इस भेदभावपूर्ण व्यवस्था ने स्थानांतरण नीति की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
‘उपलब्धियों’ की ओट में फाइलों का खेल
कुछ थाना प्रभारियों द्वारा अपनी पदस्थापना बनाए रखने के लिए कागजी कार्रवाई और दिखावटी उपलब्धियों का सहारा लिया जा रहा है। गंभीर अपराधों को हल्के धाराओं में दर्ज कर मामले को दबा देना, लूट या सामूहिक अपराधों को छेड़छाड़ में तब्दील करना जैसी कार्रवाइयाँ प्रशासन की पारदर्शिता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करती हैं।
सूत्रों का यह भी कहना है कि अधिकांश थाना प्रभारी अब अपने हमराहों पर भरोसा नहीं करते, बल्कि निजी चालकों और विश्वस्त व्यक्तियों के माध्यम से वसूली जैसे कार्य संचालित करा रहे हैं, जिससे संवेदनशील जानकारी लीक न हो।
महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण:
विंध्य वसुंधरा समाचार इन तथ्यों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं करता है। यह रिपोर्ट विभिन्न सूत्रों, जन चर्चाओं तथा स्थानीय सामाजिक प्रतिनिधियों द्वारा साझा की गई जानकारी पर आधारित है। प्रस्तुत समाचार का उद्देश्य प्रशासन एवं शासन-प्रशासन के उच्च स्तर पर जनसंवेदना, शिकायतों और संभावित अनियमितताओं की ओर ध्यान आकृष्ट कराना है। वास्तविक स्थिति की पुष्टि केवल उच्चस्तरीय विभागीय जांच उपरांत ही की जा सकती है।
रीवा जिले में पुलिस महकमे में लंबे समय से चली आ रही तैनाती व्यवस्था न केवल सरकार की घोषित नीति का उल्लंघन है, बल्कि ईमानदार और निष्ठावान अधिकारियों की उपेक्षा भी। शासन से अपेक्षा की जाती है कि इन स्थितियों की निष्पक्ष और गहन समीक्षा कर, वर्षों से जमे अधिकारियों की पदस्थापना की पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए — ताकि पुलिस प्रशासन में विश्वास और नैतिक आचरण की पुनः स्थापना हो सके।



