गौमाता के शव बिछे राष्ट्रीय राजमार्ग पर: प्रशासन की नींद कब खुलेगी? NH-30 पर एक ही रात में 7 मवेशियों की दर्दनाक मौत, सिस्टम मौन, गोवंश संरक्षण की योजनाएं सवालों के घेरे में
28 जून 2025 | विशेष रिपोर्ट – ‘विंध्य वसुंधरा समाचार’ रीवा मध्यप्रदेश
बीती रात राष्ट्रीय राजमार्ग-30 पर घटित घटनाओं ने एक बार फिर यह प्रश्न उठा दिया है — क्या वाकई हमारी सरकार और समाज को 'गौमाता' की चिंता है या सिर्फ नारेबाज़ी तक ही सीमित रह गई है?
कलवारी ब्रिज के ऊपर तेज़ रफ्तार वाहनों ने पांच गोवंशों को रौंद डाला, जिनकी मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई। इस मंजर को देखने वाले राहगीरों की आंखें भर आईं।
थोड़ी ही दूरी पर, बजरंगी ढाबा और पासघूम गांव के पास दो-दो मवेशी और चपेट में आ गए, जिससे मृतकों की संख्या कुल 9 हो गई।
स्थानीय प्रशासन ने दी औपचारिक कार्यवाही को अंजाम
घटना की जानकारी हल्का पटवारी सुधीर सिंह द्वारा नायब तहसीलदार त्यौंथर बीरेंद्र द्विवेदी को दी गई। तत्पश्चात आरआई प्रद्युम्न सिंह मौके पर पहुंचे। बंसल कंपनी टोल प्लाज़ा को सूचना देकर मृत मवेशियों को सम्मानपूर्वक दफनाया गया।
लेकिन क्या प्रशासन की भूमिका केवल पंचनामा और दफन तक सीमित रह गई है?
🟠 कितनी बार प्रशासन नींद से जागेगा?
राष्ट्रीय राजमार्गों पर तेज़ रफ्तार और आवारा पशुओं का मिलाजुला खतरा अब दैनिक संकट बन चुका है। सड़क पर मवेशियों का झुंड अचानक आ जाना अब आम दृश्य बन गया है, जिसका परिणाम जानलेवा हादसों के रूप में सामने आता है।
हाईवे पेट्रोलिंग वाहन 24 घंटे निगरानी का दावा करते हैं, लेकिन हर बार हादसे के बाद ही उनकी मौजूदगी देखने को मिलती है। इस दुर्घटना में भी स्थानीयों द्वारा सूचना देने के बाद ही कार्रवाई शुरू हो सकी, जो सिस्टम की निष्क्रियता का प्रमाण है।
🟠 गौशालाएं हैं, लेकिन जिम्मेदारी किसकी?
प्रदेश सरकार दावा करती है कि प्रत्येक ज़िले में गोशालाएं सक्रिय हैं, करोड़ों का बजट खर्च किया जा रहा है। लेकिन हकीकत यह है कि सड़कें ही गौशालाएं बन चुकी हैं। गायें और बैल झुंड बनाकर हाइवे के किनारे बैठे रहते हैं — दुर्घटनाओं को आमंत्रण देते हुए।
क्या यह मान लिया जाए कि गौशालाओं की जिम्मेदारी सिर्फ कागज़ों तक सीमित है?
क्या मवेशियों के भरण-पोषण, चिकित्सा और सुरक्षित रख-रखाव के लिए बनी योजनाएं केवल आंकड़ों तक सिमट गई हैं?
🟠 गौसंवर्धन: नारे, फोटो और चुप्पी
‘गाय हमारी माता है, जन्म-जन्म का नाता है’ — यह नारा सुनने में अच्छा लगता है, पर जब गौमाता का शव बीच सड़क पर कुचला पड़ा हो, और समाज के जिम्मेदार वर्ग राजनीति, प्रशासन और धार्मिक संगठनों के प्रतिनिधि चुप्पी साध लें — तो यह नारा मजाक लगने लगता है।
गौसेवा के नाम पर सैकड़ों संगठन पंजीकृत हैं, जिनमें से कई को अनुदान भी मिलता है, लेकिन सड़क पर पड़ी गाय के शव के पास कोई नहीं पहुंचता।
गाय की मौत पर राजनीति नहीं, नीति चाहिए — लेकिन अफसोस की बात है कि यह विषय न सत्ता पक्ष की प्राथमिकता में है, न विपक्ष की।
🟠 सड़क पर खतरा, जनता पर संकट
आवारा मवेशियों के कारण सिर्फ मवेशी ही नहीं, मानव जीवन भी संकट में है। बीते छह माह में रीवा-मऊगंज क्षेत्र में दर्जनों सड़क दुर्घटनाएं सिर्फ इसलिए हुईं, क्योंकि रात के अंधेरे में बीच सड़क पर बैठे जानवर दिखाई नहीं दिए। इनमें से कई घटनाएं घातक साबित हुईं।



