रीवा संभाग बना अवैध तस्करी का अड्डा: पशु, नशा, शराब और रेत माफिया की समानांतर अर्थव्यवस्था पर प्रशासनिक चुप्पी
हर माह करोड़ों की अवैध वसूली, किसकी तिजोरी में जा रहा यह पैसा? पुलिस और प्रशासन के संरक्षण में फल-फूल रहा है काला कारोबार
रीवा, मऊगंज व सीधी जिले मिलकर अवैध तस्करी और काले कारोबार के ऐसे जाल का निर्माण कर चुके हैं, जो अब पूरे विंध्य क्षेत्र की कानून-व्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है। पशु तस्करी, नशीले पदार्थों की तस्करी, अवैध शराब व्यापार और रेत (बालू) के अवैध खनन—इन चारों मोर्चों पर अपराधियों का बोलबाला है। सबसे गंभीर बात यह है कि इस अवैध तंत्र की हर गाड़ी, हर खेप से वसूले जा रहे लाखों-करोड़ों रुपये अंततः किसकी जेब में जा रहे हैं—यह सवाल आज भी अनुत्तरित है।
रीवा संभाग बन गया है पशु तस्करी का हब
पशु तस्करी के मामले में रीवा संभाग ने चिंताजनक स्थिति पैदा कर दी है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के सीमावर्ती जिलों से बड़ी संख्या में बकरियों, भैंसों और अन्य पशुओं को जबलपुर, नागपुर, हैदराबाद जैसे शहरों के अपंजीकृत बूचड़खानों में भेजा जा रहा है। इस पूरे रैकेट में तीन प्रमुख मार्ग सक्रिय हैं:
1. रीवा चाकघाट मार्ग
2. डाभोरा -सिरमौर मार्ग
3. हनुमना-रीवा मार्ग,
4. सीधी-गुड़ मार्ग
इन मार्गों से प्रतिदिन औसतन 300 से 400 गाड़ियाँ निकलती हैं, जबकि सप्ताह के मंगलवार, बुधवार और शुक्रवार को यह संख्या 700 से 1000 तक पहुँच जाती है।
इन गाड़ियों से वसूली के भी स्पष्ट ‘रेट’ तय हैं — छोटी गाड़ी से ₹1500, बड़ी से ₹3000 प्रति ट्रिप। यह वसूली ‘सेवा शुल्क’ के नाम पर प्राइवेट व्यक्तियों के ज़रिए की जाती है, जिनकी पहुँच सीधे उच्च अधिकारियों तक बताई जाती है।
नशे का नेटवर्क: प्रयागराज से रीवा, मेडिकल नशे की सामग्री मंगाई जाती है और सभी क्षेत्रों में फैलाई जाती है।
रीवा संभाग में मेडिकल नशा और ब्राउन शुगर की तस्करी का नेटवर्क भी बेहद संगठित हो चुका है:
मेडिकल नशा प्रयागराज के डभौरा चौक होते हुए रीवा पहुंचता है।
ब्राउन शुगर उड़ीसा और छत्तीसगढ़ से होकर सीधी, बैकुंठपुर, सिरमौर के रास्ते मनगवां रीवा पहुंचता है और यहां से उत्तर प्रदेश में प्रवेश करता है।
इन रास्तों से नशीली कफ सिरप, प्रतिबंधित गोलियां और ब्राउन शुगर की करोड़ों की खेप हर माह भेजी जाती है।
शराब माफिया के सामने बेबस तंत्र
शासन द्वारा अधिकृत लाइसेंसी दुकानों के अलावा हर गांव-गली में अवैध शराब की धड़ल्ले से बिक्री हो रही है। शराब माफिया संबंधित थानों को प्रतिमाह लाखों रुपये ‘सेवा शुल्क’ अदा कर रहे हैं। जानकारी के अनुसार, यह पूरा कारोबार ‘उच्च स्तरीय सेटिंग’ के आधार पर चलता है।
व्यवसायियों का कहना है कि जैसे ही कोई नया अधिकारी आता है, थोड़े दिन सख्ती रहती है, लेकिन जल्द ही "सिस्टम सेट" हो जाता है और व्यापार पुनः चालू हो जाता है।
रेत माफिया का आतंक: खनिज विभाग मौन
खनिज विभाग की निगरानी में भी रेत का अवैध उत्खनन धड़ल्ले से जारी है। यदि कोई वाहन ‘मंथली’ नहीं दे रहा है तो प्रति गाड़ी ₹30,000 से ₹40,000 की रिश्वत देनी पड़ती है, अन्यथा कार्रवाई की धमकी दी जाती है। वहीं जो गाड़ियाँ हर महीने ₹20,000 से ₹25,000 का भुगतान करती हैं, उन्हें बेधड़क चलने की अनुमति मिल जाती है।
आईजी गौरव सिंह राजपूत की सक्रियता ने मचाया खलबली
रीवा संभाग में आईजी गौरव सिंह राजपूत की पदस्थापना के बाद से हालात कुछ हद तक बदलने लगे हैं। पुलिस अधीक्षक मऊगंज और रीवा की टीमों ने हाल के दिनों में कई ताबड़तोड़ कार्रवाइयां कर काले कारोबारियों की कमर तोड़ दी है। इससे इन माफियाओं में दहशत का माहौल है।
क्या अब रुकेगा अवैध साम्राज्य?
एक ओर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मध्य प्रदेश के उपमुख्यमंत्री राजेन्द्र शुक्ल ने इस पूरे नेटवर्क को रोकने के लिए सहयोग की मांग की थी, वहीं दूसरी ओर रीवा संभाग की प्रशासनिक मशीनरी की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठते रहे हैं।
अब जब आईजी स्तर से सख्ती दिख रही है, तब यह देखना दिलचस्प होगा कि यह मुहिम कितने समय तक चलती है और क्या यह सिर्फ एक अस्थायी अभियान बनकर रह जाती है, या फिर रीवा को अवैध तस्करी के इस कलंक से हमेशा के लिए मुक्त किया जा सकेगा।
रीवा संभाग में फल-फूल रहे इस संगठित अपराध पर यदि प्रशासन ने स्थायी कार्यनीति और जवाबदेही तय नहीं की, तो अवैध व्यापारियों की ‘सेटिंग’ एक बार फिर व्यवस्था को निगल जाएगी। विंध्य की जनता बदलाव चाहती है—अब जिम्मेदारी प्रशासन की है कि वह इस विश्वास को बनाए रखे।







