दीपक तले अंधेरा: जल जीवन मिशन के बहाने ‘भोजन-भजन तंत्र’, जनता के नाम पर अरबों की बर्बादी!
भोपाल/रीवा।
मध्यप्रदेश में जल जीवन मिशन जैसी बहुप्रचारित योजनाएं अपने मूल उद्देश्य से भटकती नजर आ रही हैं। ग्रामीण अंचलों तक हर घर नल से जल पहुंचाने की कल्पना जब तक हकीकत बनती, तब तक यह योजना जनसेवा की बजाय “अतिथिसत्कार, भजन, भोजन और अव्यवस्थित खर्च” का पर्याय बनती जा रही है।
राजधानी भोपाल से लेकर अति पिछड़े गांवों तक, जिन योजनाओं को जनकल्याण का माध्यम बनना था, वे अब अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के आराम और प्रतिष्ठा प्रदर्शन का मंच बन गई हैं। हाल ही में वायरल हुए एक वीडियो ने सरकारी योजनाओं की क्रियान्वयन प्रक्रिया की विडंबना को उजागर कर दिया है, जिसमें योजनाओं की समीक्षा या उद्घाटन स्थलों पर भव्य भोजन, भजन और स्वागत की तैयारी दिख रही है — लेकिन पीने का पानी, जो मूल उद्देश्य है, नदारद है।
अरबों का खर्च, पर जनता प्यासे
पिछले पाँच वर्षों में जल जीवन मिशन के तहत प्रदेश में हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं, जिनका एक बड़ा हिस्सा "भोजन, नाश्ता, ठहराव, वाहन, स्वागत-सत्कार और सांस्कृतिक कार्यक्रमों" में बेहिचक बहाया गया है। अधिकारीगण गांव-गांव निरीक्षण के नाम पर पहुंचते हैं, तो उनके लिए भव्य स्वागत की व्यवस्था होती है — जिनमें दर्जनों व्यंजन, फूल-मालाएं और कभी-कभी तो भजन मंडलियां तक सम्मिलित होती हैं।
विडंबना यह है कि जिस गांव में नलों से पानी आना था, वहां के लोग आज भी हेंडपंप, कुएं और नदी से पानी भरने को मजबूर हैं। जल योजनाओं के नाम पर बनाए गए टैंकर या टंकी लंबे समय से सूखे पड़े हैं, और पाइपलाइनें या तो अधूरी हैं या जमीनी स्तर पर कभी उपयोग में नहीं आईं।
भोजन-भजन और सरकार का मौन समर्थन
यदि यह उदाहरण किसी एक जिले का होता तो इसे अपवाद माना जा सकता था। लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि मध्यप्रदेश के हर जिले में, हर योजना की समीक्षा और उद्घाटन प्रक्रिया में “खानपान की संस्कृति” एक अनिवार्य परंपरा बन चुकी है। यह परंपरा इस हद तक पहुंच गई है कि योजनाओं के लिए खरीदी सामग्री से ज़्यादा खर्च खानपान पर हो जाता है।
प्रश्न यह उठता है कि आखिर ये व्यवस्थाएं किसके लिए हो रही हैं? जब आमजन के घरों में पीने का पानी नहीं पहुंच रहा, तो फिर करोड़ों रुपये किसके लिए खर्च किए जा रहे हैं? यह “सरकारी उत्सव संस्कृति” अब जनहित से कोसों दूर होती जा रही है।
जनता भूखी, सिस्टम पेटभर
इस प्रदेश की त्रासदी यही है कि जहां एक ओर लाखों गरीब लोग ₹1 की थाली या निशुल्क राशन पर निर्भर हैं, वहीं दूसरी ओर प्रशासनिक अधिकारी योजनाओं के नाम पर होटल स्तर के भोज का उपभोग कर रहे हैं।
निशुल्क भोजन केन्द्रों पर भीड़, स्कूलों में मध्यान्ह भोजन की गुणवत्ता पर सवाल, और ग्रामीण महिलाओं का जल-संकट से रोज सामना — ये सब जनजीवन की सच्चाई हैं।
वहीं अधिकारीगण वातानुकूलित वाहनों में बैठकर आते हैं, बैठकों में मिनरल वॉटर और काजू-बादाम परोसते हैं, और फिर फोटो खिंचवाकर योजनाओं की “सफलता” का प्रचार कर सोशल मीडिया पर वाहवाही लूटते हैं।
प्रश्न यही है: कौन देगा जवाब?
क्या इन आयोजनों पर खर्च हो रही राशि की ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएगी?
क्या योजना के वास्तविक लाभार्थियों से फीडबैक लेने की कोई ठोस व्यवस्था है?
क्या यह तय किया जाएगा कि पानी की योजना में भजन-मंडली की क्या भूमिका है?
जब सरकार योजनाओं को लागू करने के लिए करोड़ों रुपये आवंटित करती है, तो उसका अंतिम उद्देश्य जनसेवा होता है, ना कि “राजकीय आतिथ्य-सत्कार” का आयोजन। लेकिन फिलहाल यह विभाजन धुंधला होता जा रहा है।
यह केवल जल जीवन मिशन की कहानी नहीं, हर विभाग में चल रहा है खर्च का उत्सव
स्वास्थ्य, शिक्षा, पंचायत, ग्रामीण विकास, महिला-बाल विकास, नगरीय प्रशासन — हर विभाग में योजनाओं के नाम पर आयोजित बैठकों में यही ढर्रा अपनाया जा रहा है। फाइलों में लक्ष्य पूरे होते हैं, मैदान में सिर्फ खर्चा और तमाशा बचता है।
जनता पूछ रही है — "हमारे हिस्से का पानी, भोजन और अधिकार कहाँ हैं?"
यदि इस गड़बड़ी को अभी नहीं रोका गया, तो वह दिन दूर नहीं जब सरकारी योजनाएं जनविश्वास की जगह उपहास का विषय बन जाएंगी। आज वीडियो वायरल हो रहे हैं, कल जनता जवाब मांगने सड़कों पर होगी।



