गुरु पूर्णिमा पर तिवनी में अनूठी पहल — ‘माँ के नाम एक पेड़’ अभियान के साथ गुरुजनों का सम्मान, लगा हरियाली का संकल्प
विंध्य वसुंधरा समाचार रीवा मध्यप्रदेश
ग्राम पंचायत तिवनी में इस वर्ष गुरु पूर्णिमा का पर्व श्रद्धा, संवेदना और पर्यावरणीय चेतना का त्रिवेणी संगम बन गया। जहाँ एक ओर गुरुजनों को सम्मानित कर भारतीय संस्कृति की परंपरा को जीवंत किया गया, वहीं दूसरी ओर “माँ के नाम एक पेड़” अभियान के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक प्रेरणादायक संदेश भी दिया गया।
ग्राम के शासकीय विद्यालय प्रांगण में आयोजित इस भव्य कार्यक्रम में जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों, शिक्षा विभाग के सदस्यों, ग्रामवासियों एवं स्कूली बच्चों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। इस अवसर पर गुरुजनों को साल, श्रीफल और एक-एक पौधा भेंट कर सम्मानित किया गया — यह पौधा उनके गुरुत्व और मातृत्व के प्रति आभार का प्रतीक बना।
160 से अधिक पौधों ने दी हरियाली की सौगात
पौधारोपण कार्यक्रम में आम, नींबू, अमरूद, चीकू जैसे फलदार पौधों के साथ गुलमोहर, कनेर, अशोक और बोगनवेलिया जैसे सजावटी पौधों का भी रोपण किया गया। कुल 160 से 180 पौधों को विद्यालय परिसर और पंचायत की खुली भूमि पर लगाया गया। पौधारोपण में बच्चों ने भी उत्साहपूर्वक भाग लिया और अपने लगाये पौधों को “परिवार का सदस्य” मानकर उसकी देखभाल का वचन दिया।
जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों ने साझा किया संदेश
इस अवसर पर विधायक नरेंद्र प्रजापति, जनपद पंचायत अध्यक्ष विकास तिवारी, वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी सरल, उद्यान विस्तार अधिकारी श्रद्धा मिश्रा, ब्लॉक शिक्षा अधिकारी सहित अनेक शिक्षाधिकारी, शिक्षक एवं कर्मचारी उपस्थित रहे।
उन्होंने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि –
“गुरु जीवन का दीपक हैं और माँ जीवन का आधार। यदि दोनों के नाम एक पेड़ लगाया जाए, तो वह केवल पर्यावरण की रक्षा नहीं करता, बल्कि भावनात्मक परंपरा को भी मजबूत करता है।”
समाज को जोड़ा गया जिम्मेदारी से
कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों ने एक स्वर में कहा कि ये पौधे सिर्फ आज का प्रतीक नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए हरियाली और जीवनदायिनी विरासत बनेंगे। विद्यालय के शिक्षकगण, ग्राम पंचायत प्रतिनिधि और छात्र–छात्राओं ने मिलकर पौधों की नियमित देखभाल का संकल्प लिया।
सांस्कृतिक और प्राकृतिक चेतना का अद्वितीय संगम
तिवनी ग्राम पंचायत का यह आयोजन एक उदाहरण है कि किस प्रकार पारंपरिक पर्वों को सामाजिक उत्तरदायित्व और प्रकृति-प्रेम के साथ जोड़ा जा सकता है। ‘माँ के नाम एक पेड़’ जैसे भावनात्मक अभियानों से समाज में जागरूकता और संवेदनशीलता का संचार होता है — जिससे न केवल वातावरण सुरक्षित होता है, बल्कि संस्कार भी पुष्पित होते हैं।




