रीवा-मऊगंज अंचल में बाढ़ और बंदरों का दोहरा संकट: शासन-प्रशासन की निष्क्रियता से त्रस्त जनजीवन
जहां गर्मी के दिनों में जल संकट से जूझते नागरिक बूंद-बूंद पानी के लिए तरसते थे, वहीं अब बारिश के दिनों में वही आबादी बाढ़ की चपेट में आकर त्राहिमाम कर रही है। यह हालात केवल प्रकृति की मार नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही शासन-प्रशासन की लापरवाही, अदूरदर्शिता और कागजी योजनाओं का प्रत्यक्ष परिणाम हैं।
रीवा जिले के शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में जलनिकासी की समुचित व्यवस्था न होने के कारण वर्षा जल का बहाव रुक जाता है, जिससे नालों का पानी गलियों और घरों में घुस जाता है। यही स्थिति मऊगंज जिले की कई तहसीलों में भी देखी गई है, खासकर मनगवां, गढ़, बाबूपुर, डगर-दुआ और पंगड़ी जैसे गांवों में हालात बद से बदतर हो गए हैं।
बाढ़ ने उजाड़ दिए आशियाने, दीवारों में पड़ी दरारें, छतों का गिरना शुरू
कई कच्चे और जर्जर मकान बारिश के पानी से बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। कई स्थानों पर मकानों की दीवारें गिर गईं, छतें टपकने लगीं और लोग अपने ही घरों में रात बिताने से डर रहे हैं। जिनके पास पक्के मकान नहीं हैं, वे अपने परिवार के साथ रिश्तेदारों या पंचायत भवनों की शरण लेने को मजबूर हैं।
वर्षों से लंबित जल निकासी परियोजनाओं पर न तो ध्यान दिया गया और न ही जनसंख्या वृद्धि के अनुपात में आधारभूत संरचना विकसित की गई। नतीजा यह है कि जहां कभी नदियां और नाले खुले बहते थे, वहां आज लोगों ने आवास बना लिए हैं। यही अतिक्रमण अब बाढ़ का मुख्य कारण बन गया है। प्रशासन सर्वे तक सीमित है, लेकिन पुनर्वास और स्थायी समाधान की कोई स्पष्ट कार्ययोजना सामने नहीं आई है।
बंदरों का आतंक: सरकार की चुप्पी से ग्रामीणों में रोष
बाढ़ की मार झेलते लोगों को अब बंदरों के आतंक ने और ज्यादा त्रस्त कर दिया है। बाबूपुर, डगर-दुआ, पंगड़ी और गढ़ क्षेत्र के ग्रामीणों का कहना है कि बंदरों की संख्या बेतहाशा बढ़ चुकी है। वे न केवल घरों की छतों को तोड़ रहे हैं, बल्कि बच्चों और महिलाओं पर हमला करने से भी नहीं चूकते।
खासकर देसी खप्पर से बने पुराने घरों की छतें बंदरों के उछलने-कूदने से टूट रही हैं। कई मकान इस वजह से गिरने की कगार पर हैं। ग्रामीणों को भय है कि किसी दिन बड़ी दुर्घटना हो सकती है, जिससे जनहानि होना तय है।
विचित्र यह है कि जहां आवारा मवेशियों की समस्या पर गौशालाएं बनाकर ध्यान दिया गया, वहीं बंदरों के आतंक को लेकर शासन-प्रशासन ने अब तक कोई नीति नहीं बनाई है। न तो वन विभाग ने कोई योजना प्रस्तुत की है और न ही जनप्रतिनिधियों ने इस मुद्दे को गंभीरता से उठाया है।
सवालों के घेरे में व्यवस्था: कब तक चलेगा सर्वे और आश्वासन का खेल?
रीवा और मऊगंज के ग्रामीण क्षेत्रों में यह पहला अवसर नहीं है जब प्राकृतिक आपदा ने लोगों की कमर तोड़ी हो। लेकिन दुखद यह है कि हर बार प्रशासन केवल "सर्वे" और "मुआवजे की प्रक्रिया" जैसे शब्दों का आश्वासन देकर कर्तव्यों की इतिश्री कर लेता है।
अब सवाल यह है —
क्या सरकार बाढ़ और बंदरों के दोहरे संकट से प्रभावित जनता की पुकार सुनेगी?
या फिर इन मुद्दों को भी किसी अगली आपदा के हवाले कर दिया जाएगा?




