सच के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला: फर्जी गैंगरेप-पॉक्सो मामले में पत्रकार दोषमुक्त, न्यायपालिका ने किया साजिश को बेनकाब
विंध्य वसुंधरा समाचार रीवा मध्यप्रदेश
मध्यप्रदेश के रीवा जिले में तीन पत्रकारों के खिलाफ दर्ज फर्जी गैंगरेप व पॉक्सो एक्ट जैसे गंभीर प्रकरण में न्यायालय ने 12 जुलाई 2025 को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सभी आरोपियों को दोषमुक्त घोषित किया। यह फैसला केवल निर्दोष पत्रकारों के लिए राहत नहीं, बल्कि पत्रकारिता को बदनाम करने की साजिश करने वालों के मुंह पर करारा तमाचा है।
इस निर्णय ने यह साफ कर दिया है कि न्यायिक व्यवस्था में भले देर हो, लेकिन सच्चाई की जीत तय है — और यह भी कि अब ऐसे षड्यंत्र रचने वाले किसी भी हालत में कानून के शिकंजे से बच नहीं सकते।
पत्रकारों के विरुद्ध रची गई साजिश का पर्दाफाश
21 मार्च 2022 को सिविल लाइन थाना क्षेत्र में हुई एक मारपीट की घटना की खबर को तीन पत्रकारों — अमर मिश्रा, उमेश सिंह और प्रद्युम्न शुक्ला — ने प्रमुखता से प्रकाशित किया था। उन्होंने लगातार पुलिस की कार्यशैली, अपराधियों से मिलीभगत और अवैध गतिविधियों के विरुद्ध रिपोर्टिंग की थी। इससे वे उन लोगों की आंखों की किरकिरी बन गए जो 'पत्रकारिता' की आड़ में अवैध उगाही और पुलिस संरक्षण में फल-फूल रहे थे।
इन्हीं ताकतों ने एक महिला को षड्यंत्र का मोहरा बनाकर, इन पत्रकारों पर गैंगरेप और पॉक्सो एक्ट के तहत गंभीर आरोप लगवा दिए। तत्कालीन पुलिस कप्तान नवनीत भसीन और थाना प्रभारी हितेंद्र नाथ शर्मा के कार्यकाल में बिना विवेचना व जांच, सिर्फ आरोप के आधार पर मामला दर्ज किया गया और एक पत्रकार को जेल भेज दिया गया।
न्यायालय का निर्णय: लोकतंत्र की मूल आत्मा की रक्षा
इस प्रकरण में वरिष्ठ अधिवक्ता धीरेंद्रनाथ चतुर्वेदी ने ठोस तर्कों और तथ्यों के साथ पत्रकारों की ओर से प्रभावी पैरवी की। हाई कोर्ट से दो पत्रकारों को अग्रिम जमानत मिली, लेकिन एक पत्रकार तीन महीने तक निर्दोष होते हुए भी जेल में रहा। अंततः 12 जुलाई को रीवा न्यायालय ने सभी तीनों पत्रकारों को दोषमुक्त करते हुए यह स्पष्ट किया कि पूरा प्रकरण झूठे गवाह, मनगढ़ंत बयान और पुलिसिया जल्दबाज़ी का परिणाम था।
न्यायालय का यह फैसला पत्रकारिता के चौथे स्तंभ की गरिमा की पुनर्स्थापना है और यह बताता है कि कानून का दुरुपयोग कर कोई भी पत्रकारों की आवाज को कुचल नहीं सकता।
झूठे आरोप लगाने वालों पर हो कड़ी कार्यवाही
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब न्यायालय ने तीनों पत्रकारों को दोषमुक्त कर दिया, तब क्या उन झूठे गवाहों, षड्यंत्र रचने वालों और पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अब वैधानिक कार्यवाही की जाएगी? क्या उनके खिलाफ आईपीसी की धाराओं के तहत फर्जीवाड़े, न्याय में बाधा डालने और सम्मान को ठेस पहुंचाने जैसे आरोप दर्ज होंगे?
मध्यप्रदेश मीडिया संघ ने यह मांग की है कि:
जांच एजेंसी यह पता लगाए कि इस साजिश में कौन-कौन लोग शामिल थे — चाहे वे पुलिसकर्मी हों, या तथाकथित पत्रकार।
फर्जी मुकदमा दर्ज करने वाले अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई हो और उनके विरुद्ध कानूनी केस चलाया जाए।
प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश इस पूरे मामले की स्वतः संज्ञान लेकर पत्रकारों की गरिमा को पुनर्स्थापित करें।
मीडिया ट्रायल और अफवाहों पर भी लगे लगाम
इस प्रकरण के दौरान कुछ यूट्यूब चैनलों और कथित मीडिया संस्थानों ने बिना पुष्टि के ऐसी खबरें प्रकाशित कीं जिनका उद्देश्य केवल पत्रकारों को अपराधी सिद्ध करना था। यह न केवल मीडिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि मीडिया के भीतर भी आत्मशुद्धि की आवश्यकता है।
ऐसे फर्जी “मीडिया ट्रायल” करने वाले चैनलों पर आईटी एक्ट, मानहानि और अफवाह फैलाने के मामलों में कानूनी कार्यवाही होनी चाहिए।
भविष्य के लिए संदेश: अब पत्रकारिता पर हमला नहीं चलेगा
रीवा न्यायालय का यह फैसला भविष्य में किसी भी पत्रकार को झूठे आरोपों में फंसाने वालों के लिए सख्त चेतावनी है। अब अगर किसी पत्रकार के खिलाफ फर्जी प्रकरण दर्ज हुआ तो केवल पत्रकार नहीं, पूरा मीडिया जगत उसके साथ खड़ा होगा — और न्यायपालिका भी।
यह फैसला लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निष्पक्ष पत्रकारिता की जीत है। इसने यह सिद्ध किया है कि:
पत्रकार की कलम को दबाने की हर कोशिश, एक दिन न्याय के कटघरे में शर्मिंदा खड़ी मिलेगी।”




